एकात्मक सरकार का अर्थ, परिभाषा और विशेषताएं

एकात्मक सरकार का अर्थ, परिभाषा और विशेषताएं

एकात्मक सरकार का अर्थ - आधुनिक समय में सरकार का संगठन संघीय (Federal) या एकात्मक (Unitary) आधार पर किया जाता है। वर्तमान राज्य की जनसंख्या और क्षेत्रफल इतना विशाल हो गया है कि राज्य को शासन की सुविधा के लिए राज्य को कई इकाइयों में विभाजित किया गया है, जिन्हें प्रांत कहा जाता है। सरकारों में इन इकाइयों का क्या संबंध है? इन संबंधों के आधार पर, सरकार के दो भाग - एकात्मक और संघीय माना जाता है। यदि प्रांतीय सरकारें अपनी इच्छानुसार शासन करने के लिए स्वतंत्र हैं और केंद्र सरकार उन्हें उनकी स्वतंत्रता से वंचित नहीं कर सकती है, तो सरकार का रूप संघीय है। इसके विपरीत, यदि प्रांतीय सरकारें केंद्र सरकार के पूर्ण नियंत्रण में होती हैं और प्रांतीय सरकारें केवल केंद्र के आदेशों पर काम करती हैं, तो यह सरकार का एकात्मक रूप है।

एकात्मक सरकार की परिभाषाएं

एकात्मक सरकार की परिभाषा (Definition of Unitary Government) - डॉ फाइनर (Finer) के अनुसार, 'एकात्मक सरकार वह प्रणाली है जिसमें सभी शक्तियां केवल एक केंद्र को सौंपी जाए और समूचे क्षेत्र में उस केंद्र की इच्छा और उसके अधिकारी कानूनी पक्ष से सर्वशक्तिमान हो।

विलोवी (Willoughby) के अनुसार, एकात्मक सरकार वह प्रणाली है जिसमें पहले सभी शक्तियां एक केंद्र सरकार को प्रदान की जाएं और वह सरकार जैसे उचित समझे, इन शक्तियों की प्रदेशों में वांट करे और इस मामले में पूरी तरह से स्वतंत्र हो।

डॉ गार्नर (Garner) के अनुसार, "जब सरकार की सभी शक्तियाँ संविधान द्वारा केवल केंद्रीय अंग और अंगों को दी जाए, जिसके साथ स्थानीय सरकारें अपनी शक्तियों और स्वतंत्रता और अपनी संप्रभुता प्राप्त करती हैं, तो वहां एकात्मक सरकार होती है। 

एकात्मक सरकार की विशेषताएं या लक्षण

उपरोक्त दी गई परिभाषाओं के आधार पर, एकात्मक सरकार की मुख्य विशेषताएं इस प्रकार हैं:-

  1. एकल शासन (Single Administration)
  2. सरकार की शक्तियों की अनुपस्थिति (No division of Powers)
  3. केंद्र सरकार द्वारा इकाइयां स्थापित की जाती हैं (Units are established by the Central Government)
  4. एकल नागरिकता (Single Citizenship)
  5. लिखित या अलिखित संविधान (Written or unwritten Constitution)
  6. कठोर या लचीला संविधान (Rigid or flexible Constitution)
  7. न्यायपालिका की सर्वोच्चता आवश्यक नहीं है (Supremacy of Judiciary is not essential) 

1. एकल शासन (Single Administration) - एकात्मक सरकार की एक एकल शासन प्रणाली होती है। इसका मतलब है कि एक ही सर्वशक्तिमान केंद्र सरकार होगी, एक ही विधायिका और एक कार्यकारी होगी। प्रांतों के लिए अलग-अलग सरकारें और अलग-अलग संविधान नहीं होंगे। इंग्लैंड, जापान और चीन में एकात्मक सरकार है।

2. सरकार की शक्तियों की अनुपस्थिति (No division of Powers) - सरकार की इस प्रणाली में सभी शक्तियाँ एक ही केंद्र सरकार में निहित हैं और अलग-अलग स्वतंत्र प्रांत मौजूद नहीं होते। इसलिए, इस प्रणाली के तहत केंद्र और प्रांतों के बीच शक्ति का कोई विभाजन नहीं होता।

3. केंद्र सरकार द्वारा इकाइयां स्थापित की जाती हैं (Units are established by the Central Government) - प्रशासन की सुविधा के लिए, केंद्र सरकार देश को कुछ इकाइयों या प्रांतों में विभाजित कर सकती है। केंद्र सरकार द्वारा इन इकाइयों के अधिकारियों में प्रशासनिक शक्तियां दी जाती हैं और केंद्र सरकार किसी भी समय इन्हें कम या बढ़ा सकती है। केंद्र सरकार चाहे तो उन इकाइयों को भी समाप्त कर सकती है।

4. एकल नागरिकता (Single Citizenship) - जहाँ एकात्मक सरकार है, वहाँ संघीय राज्यों की तरह कोई दोहरी नागरिकता नहीं होगी, लेकिन इंग्लैंड, जापान और फ्रांस की तरह सभी नागरिकों के लिए समान नागरिकता होगी।

5. लिखित या अलिखित संविधान (Written or unwritten Constitution) - जहां एकात्मक सरकार है वहां संविधान लिखित और अलिखित दोनों हो सकते हैं। जैसे इंग्लैंड में एक एकात्मक सरकार है और संविधान अलिखित है और फ्रांस में भी एकात्मक सरकार है, लेकिन संविधान लिखित है।

6. कठोर या लचीला संविधान (Rigid or flexible Constitution) - एकात्मक सरकार में, संविधान कठोर और लचीला दोनों हो सकता है। जिस तरह इंग्लैंड का संविधान लचीला है, लेकिन फ्रांस का संविधान कुछ कठोर है।

7. न्यायपालिका की सर्वोच्चता आवश्यक नहीं है (Supremacy of Judiciary is not essential) - एकात्मक प्रणाली में न्यायपालिका का सर्वोच्च होना और न्यायिक समीक्षा की शक्ति का होना आवश्यक नहीं है। इंग्लैंड, एकात्मक राज्य है लेकिन उसकी न्यायपालिका को न्यायिक समीक्षा की शक्ति प्राप्त नहीं है। दूसरे शब्दों में, संसद द्वारा पास किए कानूनों को वहां की न्यायपालिका द्वारा रद्द नहीं जा सकता है।

संक्षेप में, हम कह सकते हैं कि सरकार की एकात्मक प्रणाली में सारी शक्ति केंद्र सरकार के पास होती है।  शक्तियों को केंद्रीय और प्रांतीय सरकारों के बीच विभाजित नहीं किया जाता है। प्रशासन को सुविधाजनक बनाने के लिए प्रांत या इकाइयाँ बनाई जा सकती हैं, लेकिन इन इकाइयों का अस्तित्व संविधान द्वारा नहीं बनाया गया है, बल्कि केंद्र सरकार अपनी इच्छा के अनुसार इन इकाइयों को अपनी मर्ज़ी से बनाती और खत्म कर सकती है। इन इकाइयों के पास कोई स्वतंत्र शक्ति नहीं होती है और इन्हें जो भी अधिकार प्राप्त होते हैं, वे केंद्र से ही प्राप्त होते हैं, जिसे केंद्र सरकार किसी भी समय वापस ले सकती है।

दोस्तों अगर आपको हमारी जानकारी अच्छी लगी तो आप इसे शेयर करे और किसी भी प्रकार की जानकारी के लिए कमेंट करें और हमें फालो कर ले ताकि आपको हमारी हर पोस्ट की खबर मिलती रहे।

अधिकारों और कर्तव्यों में संबंध

अधिकारों और कर्तव्यों का परस्पर संबंध होता है। जहां व्यक्ति के विकास के लिए राज्य समाज में उसको अनेक अधिकार दिए जाते हैं वहां व्यक्ति से समाज और राज्य कुछ कर्तव्यो की उम्मीद भी रखते हैं। कर्तव्य का पालन किए बिना व्यक्ति अधिकारों का हकदार नहीं बन सकत। अधिकार उन फलों के बराबर हैं जिन्हें कर्तव्यों के बीज बोए बिना प्राप्त नहीं किया जा सकता है। इंसान अपने अधिकार का प्रयोग तभी कर सकता है जब वह अपने कर्तव्यों के प्रति सच्चा हो। अधिकारों और कर्तव्यों का इतना घनिष्ठ संबंध है कि उन्हें अलग करना असंभव है क्योंकि एक के बिना दूसरे की महानता कम हो जाती है। इस कथन के समर्थन में निम्नलिखित तर्क दिए जा सकते हैं:-

अधिकारों और कर्तव्यों में संबंध

1. प्रत्येक अधिकार से संबंधित एक कर्तव्य भी है (Every right has a corresponding Duty) - नागरिकों को अनेक किस्म के अधिकार राज्य की तरफ से प्राप्त होते हैं। भले ही राज्य संविधान में इन अधिकारों से संबंधित कर्तव्यों का उल्लेख न किया जाए, तब भी यह हर अधिकार के साथ जुड़ा उसका कर्तव्य होता है। मेरे जो अधिकार हैं वह दूसरे व्यक्तियों के लिए कोई कर्तव्य निश्चित करते हैं। उदाहरण के लिए, मुझे जीवन का अधिकार है और मैं इस अधिकार का आनंद तभी ले सकता हूं जब अन्य लोग इस अधिकार के प्रति अपना कर्तव्य पूरा करें। मेरा जीवन का अधिकार अन्य लोगों का कर्तव्य बनाता है कि वे किसी भी तरह से मुझे नुकसान न पहुंचाएं। उसी तरह, मेरी संपत्ति का अधिकार दूसरों के कर्तव्य को निर्धारित करता है कि मेरी संपत्ति को नुकसान या क्षति न पहुंचायें और न ही उसे लूटने आदि की कोशिश करे। सच तो यह है कि जो चीज़ एक व्यक्ति के लिए अधिकार है वह दूसरों के लिए कर्तव्य है।

2. अधिकार अपने आप में भी एक कर्तव्य है (A right is also a duty in itself) - अधिकारों और कर्तव्यों के बीच एक संबंध यह भी है कि अधिकार भी अपने आप में एक कर्तव्य है। यदि ऐसा न हो, तो हर व्यक्ति को अपना अधिकार मानने का अवसर नहीं मिलेगा। एक व्यक्ति को जहाँ अनेक प्रकार के अधिकार मिलते हैं, वहा इन अधिकारों से उसे यह कर्तव्य भी प्राप्त होता हैं कि वह इस बात का ध्यान भी रखें कि जो अधिकारी उसे प्राप्त हैं वह अधिकार दूसरे व्यक्तियों को भी प्राप्त हैं। इसलिए, प्रत्येक व्यक्ति को अपने अधिकारों का इस तरह से उपयोग करना चाहिए कि दूसरों के अधिकारों का उल्लंघन न हो और उसके अधिकारों का प्रयोग अन्य व्यक्तियों के अधिकारों के रस्ते में एक बाधा साबित न हो।

उदाहरण के लिए, मुझे सरकारी सड़कों का उपयोग करने का अधिकार है, लेकिन साथ ही मेरा यह कर्तव्य है कि मैं दूसरों के अधिकारों को पहचानूं और अपने अधिकारों का इस तरह से लाभ उठाने का प्रयास करूं कि अन्य लोग अपने अधिकारों का पूरी तरह से उपयोग कर सकें।

3. प्रत्येक अधिकार के साथ इसके उचित उपयोग का कर्तव्य शामिल है (Every right has a duty of its proper use) - नागरिकों को कई अधिकार प्राप्त होते हैं।  इन अधिकारों से संबंधित नागरिक का यह कर्तव्य है कि इन अधिकारों का उचित प्रयोग करे। यदि अधिकारों का प्रयोग नहीं किया जाता है, तो इसके भयानक परिणाम होते हैं। उदाहरण के लिए, लोकतंत्र में, प्रत्येक नागरिक को वोट देने का अधिकार है। यदि नागरिक इस अधिकार का प्रयोग करने में लापरवाही करते हैं, तो देश में स्वार्थी लोगों की सरकार स्थापित की जाएगी।

4. प्रत्येक अधिकार अपने साथ समाजिक कल्याण का कर्तव्य रखता है (Every right carries a duty towards social welfare) - व्यक्ति समाज का अभिन्न अंग है, इसका अस्तित्व और विकास समाज में ही संभव है।  नागरिकों को समाज में ही अधिकार मिल सकते हैं, समाज के बाहर अधिकार होना संभव नहीं है। मनुष्य की सुरक्षा के लिए समाज जिम्मेदार है। जहाँ समाज व्यक्ति के लिए इतना उपयोगी साबित होता है, वहां व्यक्ति के भी समाज के प्रति कई कर्तव्य भी होते हैं। उन मुख्य कर्तव्यों में से एक समाज के कल्याण के लिए अपने अधिकारों का प्रयोग करना है।

5. प्रत्येक अधिकार के साथ राज्य के प्रति कर्तव्य है (Every right has a duty towards state) - व्यक्ति को राज्य के माध्यम से ही अधिकार मिलते हैं। उनकी सुरक्षा के लिए राज्य ही जिम्मेदार है। राज्य के भीतर नागरिक इन अधिकारों का आनंद ले सकते हैं। राज्य के बाहर के अधिकारों की कल्पना नहीं की जा सकती। राज्य ही एक ऐसा अनुकूल वातावरण बनाता है जिसमें नागरिक अपने अधिकारों का आनंद ले सकते हैं। राज्य व्यक्ति के लिए हर सुविधा प्रदान करता है ताकि उसके जीवन का बहुआयामी विकास हो सके। इन अधिकारों के साथ, व्यक्ति का राज्य के प्रति यह कर्तव्य है कि वह राज्य के हर कानून का पालन करे और राज्य को हर क्षेत्र में सहयोग दे।

6. अधिकार और कर्तव्य अंतर-संबंधित (Rights and Duties Inter-related) - संक्षेप में, हम कह सकते हैं कि नागरिक के कर्तव्य और अधिकार एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। श्री निवास शास्त्री के अनुसार, कर्तव्य और अधिकार एक ही चीज हैं, केवल अंतर उन्हें देखने में है। वे एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। अधिकारों का वास्तविक महत्व कर्तव्यों के दायरे में सामने आता है। लास्की के अनुसार, अधिकारों और कर्तव्यों में निम्नलिखित चार प्रकार के संबंध हैं:-

(1) मेरे अधिकार आपके कर्तव्य हैं।

(2) मेरे अधिकार में मेरा यह कर्तव्य छिपा है कि मैं आपके समान अधिकारों को स्वीकार करूँ।

(3) मैं अपने अधिकारों का प्रयोग समाज के लिए करूँ।

(4) क्योंकि राज्य मुझे अधिकार देता है और इनकी रक्षा करता है, इसलिए राज्य की सहायता करना मेरा कर्तव्य है।

(5) मेरा अधिकार आपका कर्तव्य है और आपका अधिकार मेरा कर्तव्य है।

निष्कर्ष (Conclusion)

आधुनिक कंप्यूटर प्रौद्योगिकी विकास के युग में, किसी व्यक्ति के लिए अपने कर्तव्यों को पूरा किए बिना केवल अधिकारों की अपेक्षा करना मूर्खता होगी। वर्तमान युग में, अधिकारों का क्षेत्र बहुत विशाल हो गया है क्योंकि न केवल राजनीतिक संसार में, बल्कि सामाजिक और आर्थिक संसार में भी कई क्रांतिकारी परिवर्तन हुए हैं। इस तरह के परिवर्तनों का जहां मनुष्य को व्यावहारिक लाभो प्राप्त करने का अधिकार है, वहाँ यह युग विनाशकारी परमाणु और अन्य युद्धों से बचने के लिए प्रयास करने या अपने कर्तव्य को पूरा करने के लिए जोर देता है। यह तथ्य इस विचार का समर्थन करता है कि अधिकार और कर्तव्य अविभाज्य हैं और यह एक ही सिक्के के दो पहलू हैं और इनकी अंतर्संबंधता सभ्यता के विकास के साथ ओर ज्यादा विकसित हो रही हैं।

दोस्तों अगर आपको हमारी जानकारी अच्छी लगी तो आप इसे शेयर करे और किसी भी प्रकार की जानकारी के लिए कमेंट करें और हमें फालो कर ले ताकि आपको हमारी हर पोस्ट की खबर मिलती रहे।

अधिकारों की परिभाषा और विशेषताएं

इंसान एक सामाजिक प्राणी है और उसके लिए समाज के बिना जीवित रहना और विकसित करना बहुत मुश्किल है। समाज में रहने वाला व्यक्ति तभी विकसित हो सकता है जब उसे विकास के लिए समाज या राज्य से आवश्यक सुविधाएं मिलें। इन सुविधाओं को अधिकार कहा जाता है।
अधिकारों की परिभाषा और विशेषताएं

अधिकारों की परिभाषा (Definition of Rights) - "अधिकारों" की परिभाषा विद्वानों ने अलग-अलग रूप में दी है, जैसे कि -
  1. वाइल्ड (Wilde) के अनुसार, "कुछ कार्य को करने की स्वतंत्रता की उचित मांग अधिकार है।"
  2. बोसांके (Bossanquet) के अनुसार, "अधिकार ऐसी माँगें हैं जिसे समाज प्रवान करता है और राज्य लागू करता है।"
  3. लास्की (Laski) ने अधिकारों की बहुत सुंदर परिभाषा बताई है उनके अनुसार, "अधिकार उन सामाजिक अवस्थाओं का नाम है जिनके बिना कोई व्यक्ति पूर्ण रूप से विकास नहीं कर सकता।"
  4. डॉ बेनी प्रसाद (Dr. Beni Prasad) के अनुसार, “अधिकार सामाजिक जीवन की वे स्थितियाँ हैं जिनके बिना मनुष्य सामान्य रूप से अपना पूर्ण विकास नहीं कर सकता।"
  5. श्रीनिवास शास्त्री (Sriniwas Shastri) के अनुसार, "संक्षेप में, अधिकार वह व्यवस्था, नियमों या रीति की है जो किसी समुदाय के कानून द्वारा प्रवानित है और नागरिकों के सर्वोच्च नैतिक कल्याण में सहायी है।"
  6. टी. एच. ग्रीन (T.H. Green) के अनुसार, "अधिकार वे शक्तियां हैं जो मनुष्य के नैतिक प्राणी होने की वजह से उसके पेशे की पूर्ति में आवश्यक हैं।"
  7. सालमंड (Salmond) के कथन अनुसार, अधिकार वह हित है जो उचितता के नियम द्वारा सुरक्षित है। यह एक ऐसा हित है जिसका सत्कार करना उचित है और जिसका उल्लंघन एक गलती है।"
  8. हॉलैंड के अनुसार, अधिकार किसी एक व्यक्ति की ऐसी शक्ति है जो दूसरों के कार्य को प्रभावित कर सकती है। यह शक्ति अपनी ताकत के कारण नहीं बल्कि समाज की राय और शक्ति होती है।
संक्षेप में, हम कह सकते हैं कि चाहे विभिन्न विद्वानों ने अधिकारों की अलग-अलग परिभाषाएँ दी हैं, लेकिन सभी परिभाषाओं का तथ्य यह है कि अधिकार मनुष्य की वैध माँगें हैं जो उसके विकास और कल्याण के लिए आवश्यक हैं और जिन्हें समाज या राज्य उचित समझता हुआ स्वीकार कर लेता है। दूसरे शब्दों में, अधिकार सामाजिक जीवन की वे स्थितियाँ हैं जो व्यक्ति के पूर्ण विकास के लिए आवश्यक हैं और जिन्हें समाज द्वारा स्वीकार किया जाता है और जिन्हें राज्य द्वारा प्रबंधित किया जाता है।

अधिकार के मुख्य तत्व और विशेषताएं

अधिकारों की उपर्युक्त परिभाषाएँ से अधिकारों के कुछ विशेष तत्वों को प्रकट होते हैं जिन्हें संक्षेप में निम्न व्यक्त किया गया है:-

1. अधिकार गतिशील और परिवर्तनशील हैं - किसी भी समाज में किसी भी प्रकार के अधिकारों को स्थायी रूप से निश्चित नहीं किया जा सकता है। अधिकारों की मांग प्रत्येक समाज के सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक और परिवर्तनशील वातावरण पर निर्भर करती है। इसी कारण जैसे जैसे सभ्यता विकास कर रहीं है हर देश में नए अधिकारों की मांग की जा रही है और जिन अधिकारों का आधुनिक वैज्ञानिक युग में कोई महत्व नहीं रहा है, उन्हे खत्म किया जा रहा है।

2. अधिकार किसी व्यक्ति या व्यक्तियों के समूह का दावा है - अधिकार समाज से कुछ सुविधाएं प्राप्त करने के लिए व्यक्ति का एक दावा है। मनुष्य की कई स्वाभविक रूचियाँ हैं। उनकी संतुष्टि के लिए मनुष्य को सामाजिक अवस्थाओं की आवश्यकता है और  व्यक्ति या व्यक्तियों का समूह इन अवस्थाओं की मांग करता है और समाज और राज्य उस दावे को उचित मानते हुए प्रवान कर लेते हैं।

3. अधिकार उचित और नैतिक होने चाहिए - कोई भी नागरिक जुआ या आत्महत्या करने की अनुमति नहीं मांग सकता क्योंकि ये मांगें व्यक्ति के सर्वोत्तम हित में नहीं हैं। केवल उन मांगों को अधिकारों के रूप में स्वीकार किया जा सकता है जो व्यक्ति के मानसिक और शारीरिक विकास के लिए आवश्यक है, जो नैतिक रूप से स्वीकार्य हैं। व्यक्ति के अनैतिक जो अनुचित मांगों को राज्य द्वारा अधिकार के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता।

4. अधिकारों को समाज द्वारा मान्यता दी जानी चाहिए - किसी व्यक्ति की कोई मांग तब तक अधिकार नहीं बन सकती जब तक कि उसे समाज की स्वीकृति नहीं मिल जाती। समाज व्यक्तियों की केवल उन मांगों को स्वीकार करता है जो सभी मानव के विकास के लिए आवश्यक हैं। व्यक्ति की विशेष स्वार्थी मांगें समाज स्वीकार नहीं करता। इसलिए उन्हें अधिकार नहीं कहा जा सकता।

5. अधिकार सभी के लिए समान हैं - उन सहूलतों का नाम अधिकार है जो समाज के प्रत्येक व्यक्ति के विकास के लिए दिए गए हैं। अधिकारों के क्षेत्र में ऊच-नीच, अमीर और गरीब, सफेद और काले और पुरुष और महिला के बीच कोई भेदभाव नहीं है। उन सुविधाओं को अधिकार कहना उचित नहीं है जो कुछ व्यक्तियों तक सीमित हैं जैसा कि - दक्षिण अफ्रीका में, सितंबर 1992 तक रंग के आधार पर गोरों द्वारा प्राप्त राजनीतिक विशेषाधिकारों को अधिकार नहीं कहा जा सकता था, क्योंकि उन विशेषाधिकारों का केवल गोरों द्वारा आनंद लिया जाता था और काले लोगों को उन विशेषाधिकारों से वंचित किया जाता था।  जन्म, जाति, धर्म, रंग, नस्ल, वंश आदि के आधार पर प्रदान की गई सुविधाओं को सार्वभौमिक अधिकार नहीं कहा जा सकता है।

6. अधिकार हमेशा सीमित हैं - नागरिक का प्रत्येक अधिकार सीमित है क्योंकि यदि अधिकारों की खुल दी जाए, तो समाज की शांति खत्म हो जाएगी। जिस व्यक्ति को भाषण देने और विचार प्रकट करने की आजादी है, वह इस स्वतंत्रता का उपयोग हिंसा के कार्यों को कराने के लिए नहीं कर सकता। उसका अधिकार सीमित है और इसे केवल समाज के स्वीकृत क्षेत्र में ही प्रयोग किया जा सकता है।

7. अधिकार और कर्तव्य संबंधित हैं - अधिकार और कर्तव्य एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। प्रत्येक अधिकार से कर्तव्य संबधित है। मेरा जो अधिकार है, वह दूसरों का कर्तव्य है। जो दूसरों का अधिकार है, वह मेरा कर्तव्य है। कर्तव्यों के बिना किसी भी अधिकार का कोई महत्व नहीं है।

8. अधिकारों का कल्याणकारी चरित्र  - अधिकारों का स्वरूप कल्याणकारी होना चाहिए, जिसका अर्थ है कि अधिकार केवल व्यक्ति के व्यक्तिगत विकास के लिए ही नहीं होने चाहिए, बल्कि उनका रूप ऐसा होना चाहिए जिससे पूरे समाज का कल्याण हो सके। जो सहूलियतें या स्थितियां कुछ व्यक्तियों के विकास के लिए लाभकारी होती हैं परंतु समूचे समाज के कल्याण के लिए योगदान नहीं देती समाज की तरफ से अधिकारों के रूप में सवीकार नहीं की जा सकती।

9. अधिकारों को राज्य द्वारा संरक्षित किया जाना चाहिए - राज्य द्वारा अधिकारों के संरक्षण का प्रावधान अधिकारों की एक आवश्यक विशेषता है। जिस अधिकारों को राज्य द्वारा संरक्षित नहीं किया जा सकता है, सामाजिक हैं जीवन में उनका महत्व कम ही होता है।

10. अधिकार केवल एक मानव समाज में ही संभव हैं - णानव अधिकारों के लिए समाज का अस्तित्व बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि मानव को मानव समाज में ही उसके अधिकार दिए जा सकते हैं। समाज के बाहर किसी को कोई भी कानूनी अधिकार नहीं मिल सकता है। अधिकारों के पीछे कानूनी शक्ति होना अधिकारों की पहली शर्त है। समाज के बाहर कानूनी अधिकार कौन देगा और कौन इसे लागू करेगा? राज्य के बिना अधिकारों को लागू नहीं किये जा सकते और समाज द्वारा मान्यता प्राप्त अधिकारों को लागू करने के लिए राज्य कानूनी बल प्रदान करता है।

निष्कर्ष (Conclusion)

अधिकारों के तत्वों के बारे में, हम संक्षेप में कह सकते हैं कि अधिकार व्यक्ति की उन जायज मांगों का नाम है जिसे समाज द्वारा स्वीकार किया जाता है और जिसे राज्य द्वारा लागू किया जाता है। अधिकार सभी के लिए सामान्य हैं और इनको एक सीमित तरीके से आनंद लिया जा सकता है। अधिकारों के साथ कर्तव्यों का होना जरुरी है और अधिकार केवल समाज में ही संभव हो सकते हैं। समाज के बाहर अधिकारों के अस्तित्व की कल्पना नहीं की जा सकती है। अधिकार केवल कुछ नागरिकों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि समानता के आधार पर सभी नागरिकों को प्रदान किए जाते हैं।

राष्ट्रीय एकीकरण का अर्थ और परिभाषा

राष्ट्रीय एकीकरण का अर्थ और परिभाषा
आधुनिक काल के राज्यों में विभिन्न धर्मों, जातियों और संस्कृतियों के कई लोग रहते हैं। राष्ट्रीय एकीकरण की अधिक आवश्यकता उन राज्यों में महसूस की जाती है जहां जनसंख्या में धार्मिक, भाषाई, जाति या नस्ल और क्षेत्रीय अंतर पाए जाते हैं। एक देश में रहने वाले विभिन्न संस्कृतियों के लोगों के बीच राष्ट्रवाद की भावना या एक ही राष्ट्र से संबंधित विकास होन की भावना राष्ट्रीय एकता की धारणा का मुख्य उद्देश्य है। मायरन वीनर (Myron Weiner) का विचार है कि "राष्ट्रीय एकीकरण की अवधारणा का अर्थ क्षेत्रीय राष्ट्रवाद की भावना को विकसित करना है जो अन्य वर्ग की वफादारी को समाप्त करती है या उन छोटी वफादारीयो से श्रेष्ठ होती है।"

भारत के दिवंगत राष्ट्रपति डॉ. एस. एस राधा कृष्णन (Dr. S. Radha Krishanan) के अनुसार, “राष्ट्रीय एकीकरण कोई मकान नहीं है जिसे मसाले और ईंटों से बनाया जा सकता हो। यह एक औद्योगिक योजना भी नहीं है जिसे विशेषज्ञों द्वारा विचार किया और लागु किया जा सकता हो।  इसके विपरीत, एकीकरण एक विचार है जिसका निवास लोगों के दिलों में होना चाहिए। यह एक चेतना है जो बड़े पैमाने पर जागरूकता बढ़ाती है।

एच. ऐ. गनी (H.A. Gani) के अनुसार, "राष्ट्रीय एकीकरण एक सामाजिक, मनोवैज्ञानिक और शैक्षणिक प्रक्रिया है जिसके माध्यम से लोगों के दिलों में एकता, एकजुटता और सद्भाव की भावना विकसित होती है और उनमें साझी नागरिकता या राष्ट्र के प्रति वफादारी की भावना पैदा होती है।"

संक्षेप में, हम कह सकते हैं कि राष्ट्रीय एकीकरण का अर्थ लोगों की सामाजिक, धार्मिक, भाषाई, क्षेत्रीय और सांस्कृतिक भिन्नता को बनाए रखते हुए समुचे लोगों में एक ही राष्ट्र से संबंधित होने की भावना, साँझी नागरिकता और राष्ट्र के प्रति समर्पण की भावनि और वफादारी विकसित करना। 'भिन्नताओं में एकता' (Unity in Diversity) विकसित करने की प्रक्रिया राष्ट्रीय एकीकरण का सार है।

दोस्तों अगर आपको हमारी जानकारी अच्छी लगी तो आप इसे शेयर करे और किसी भी प्रकार की जानकारी के लिए कमेंट करें और हमें फालो कर ले ताकि आपको हमारी हर पोस्ट की खबर मिलती रहे।

महात्मा गांधी के राजनीतिक विचार

1936 में, गांधी जी ने कहा था, 'गांधीवाद कुछ भी नहीं है।  मैं अपने पीछे किसी भी पंथ को नहीं छोड़ना चाहता। मैं एक नया सिद्धांत बनाने का दावा नहीं करता। मैंने केवल अपने तरीके के अनुसार अपने दैनिक जीवन और समस्याओं के लिए शाश्वत सत्य को लागू करने की कोशिश की है। मैंने जो कहा है, उसमें मेरी विचारधारा है। इसे गांधीवाद मत कहो, इसमें कोई वाद नहीं है। हालाँकि गांधीजी अपने विचारों को किसी विशेष सिद्धांत को कहने से हिचक रहे हैं, लेकिन हम कह सकते हैं कि गांधीजी के मानव जीवन और राजनीतिक समाज पर कई महत्वपूर्ण विचार थे जिन्हें हम गांधीवाद का नाम दे सकते हैं। यहां गांधीजी के मुख्य राजनीतिक विचारों का संक्षिप्त विवरण दिया गया है -

महात्मा गांधी के राजनीतिक विचार

1. राज्य के बारे में विचार - गांधीजी राज्य को एक आवश्यक या प्राकृतिक या दैवीय संस्थान नहीं मानते थे। वे राज्य के वर्तमान स्वरूप के भी खिलाफ थे और राज्य को एक स्मृति मशीन के रूप में मानते थे। विरोध का मुख्य आधार यह था कि राज्य हिंसा या शक्ति पर आधारित होता है। राज्य उस शक्ति का उपयोग करता है जिसके द्वारा व्यक्ति की स्वतंत्रता नष्ट हो जाती है और व्यक्ति अपने जीवन को संतुलित तरीके से विकसित नहीं कर सकता है। उनका विचार था कि यह राजनीतिक शक्ति अंतिम लक्ष्य नहीं है, लेकिन एक ऐसा साधन है जिसके द्वारा व्यक्तियों को अपने जीवन का सर्वांगीण विकास करने में सक्षम बनाया जा सकतता है। लेकिन गांधीजी इस बात से निराश थे कि वर्तमान राज्य इस कसौटी पर खरे नहीं उतरे। गांधी जी के अनुसार, "राज्य एक संगठित तरीके से हिंसा का प्रतिनिधित्व करता है। व्यक्ति के पास एक आत्मा है लेकिन राज्य एक नि: स्वार्थ साधन की तरह है। इसको हिंसा से कभी भी अलग नहीं किया जा सकता कयोंकि हिंसा ही इसकी उत्पत्ति का स्रोत है।

    2. आदर्श समाज - वर्तमान राज गांधी जी की नजर में सत्ता पर आधारित है। ऐसे राज्य को समाप्त करके, गांधीजी एक आदर्श समाज की स्थापना करना चाहते थे, जो अहिंसा पर आधारित हो और जिसमें व्यक्तियों को अधिकतम स्वतंत्रता प्राप्त हो। गाँधी जी का आदर्श समाज राज्यहीन और वर्गविहीन होगा, जहाँ स्वतंत्र गाँव इसकी मूल इकाइयाँ होंगी। ऐसे समाज में, पुलिस या सैन्य शक्ति की इतनी आवश्यकता नहीं होगी क्योंकि इसमें रहने वाले लोग शासन और संयम का पालन करेंगे। यह एक धर्मनिरपेक्ष समाज होगा जहां सभी को अपनी पसंद के किसी भी धर्म का पालन करने की स्वतंत्रता होगी। गांधीजी का आदर्श समाज लोकतांत्रिक सिद्धांतों पर आधारित होगा। प्रत्येक गाँव में एक पंचायत स्थापित की जाएगी, जिसमें गाँव को चलाने के लिए पूरी शक्तियाँ होंगी। इस तरह सभी सवैनिर्भर और सवै आश्रित गांव एक संघ की इकाइयों के रूप में काम करेंगे। इस समाज में पंचायती राज के साथ, शक्तियों का कोई केंद्रीकरण नहीं होगा। गांधीजी के काल्पनिक समाज में बड़े शहर, अदालत और जेल नहीं होंगे, बल्कि छोटे-छोटे गाँव, पंचायत और सुधार गृह होंगे। गांधीजी के आदर्शवादी राज्य में राजनीतिक शक्ति और आर्थिक प्रबंधन का विकेंद्रीकरण होगा।

    3. राज्य के कार्य क्षेत्र - चाहे गांधीजी का उद्देश्य एक अहिंसक समाज की स्थापना करना था, लेकिन उन्होंने इस तथ्य को महसूस किया कि उनका लक्ष्य तुरंत हासिल नहीं होने वाला था। उन्होंने खुद कहा था, "मैं तुरंत इस तरह के सुनहरे युग की कल्पना नहीं कर सकता, लेकिन मैं अहिंसक समाज में दृढ़ता से विश्वास करता हूं।" इस प्रकार गांधीजी राज्य की सत्ता को तुरंत समाप्त नहीं करना चाहते थे, बल्कि वे राज्य के कार्य के दायरे को सीमित करना चाहते थे। उनका मानना ​​था कि राज्य को न्यूनतम कार्य करना चाहिए और व्यक्ति के व्यक्तिगत मामलों में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। वह चाहते थे कि लोगों को न्याय राज्य अदालतों के माध्यम से नहीं बल्कि पंचायतों के माध्यम से न्याय मिले। उनका विचार था कि राज्य की शक्तियों में वृद्धि नहीं की जानी चाहिए क्योंकि राज्य की बढ़ती शक्ति व्यक्तिगत स्वतंत्रता को नष्ट कर देती है।

    4. अहिंसा - अहिंसा गांधीजी के जीवन और दर्शन का एक अभिन्न अंग था। उनका विचार था कि जिस प्रकार पशु साम्राज्य में हिंसा एक आवश्यक कानून है, उसी प्रकार अहिंसा मानव समाज का मूल आधार है। अहिंसा का शाब्दिक अर्थ बल प्रयोग करके किसी को मारना नहीं है।  लेकिन गांधीजी ने अहिंसा शब्द का अर्थ बहुत व्यापक रूप से लिया है। उन्होंने अहिंसा को आध्यात्मिक और दैवीय अहिंसा शक्ति के रूप में वर्णित किया है। उनके अनुसार, अहिंसा का अर्थ किसी भी तरह से विचारों या शब्दों या कर्मों के माध्यम से किसी को नुकसान पहुंचाना या नुकसान पहुंचाना नहीं है। गांधीजी के विचार में, दूसरों के बारे में बुरा सोचना या कठोर भाषण देना भी हिंसा है। गांधीजी का विचार है कि जो व्यक्ति अहिंसा में विश्वास करता है, वह किसी से भी नफरत नहीं करता और किसी को भी अपना दुश्मन नहीं मानता। गांधीजी के विचार में, अहिंसा न केवल एक नकारात्मक अवधारणा है, बल्कि यह एक सकारात्मक अवधारणा भी है। जबकि इसका मतलब दूसरों को नुकसान पहुंचाना नहीं है, बल्कि यह दूसरों का भला करने का भी संकेत है।

    5. सत्याग्रह - बुराई से लड़ने के लिए सत्याग्रही गांधी जी का एक विशेष तरीका है। सत्याग्रही गांधीवाद का दिल और आत्मा है और यह अत्याचार से लड़ने के लिए दबे हुए लोगों के लिए गांधीजी का विशेष उपहार है। संक्षेप में सत्याग्रही का अर्थ वह विधि है जिसके द्वारा व्यक्ति को प्रेम और आत्म-पीड़ा के साथ बुराई, अन्याय और अत्याचार का सामना करना है। सत्यहि का शाब्दिक अर्थ है "सत्य पर डटे रहता है।" एक सच्चा सत्याग्रही प्रेम से बुराई का विरोध करता है। वह खुद को कष्ट पहुँचाता है, अपने विरोधी को नहीं, और इस तरह अपने विरोधियों की आंतरिक भावनाओं को प्रेरित की कोशिश करता है। गांधीजी के विचार में, सत्याग्रह का अर्थ है कष्टों को सहन करके सत्य का प्रगटावा करना। सत्याग्रही हिंसा के बिल्कुल विपरीत है और गांधीजी के विचार में यह बहादुर और मजबूत लोगों का हथियार है। गांधी जी ने सत्याग्रही के कई तरीकों का वर्णन किया है। ऐसी विधियों में असहयोग, हड़ताल, धरने देना, सामाजिक बॉयकॉट, सिवल न फुरमानी, उपवास और हिजरत आदि शामिल हैं।

    6. धर्म और राजनीति - गांधीजी धर्मनिरपेक्ष राजनीति के कट्टर विरोधी थे। उनका विचार था कि राजनीति को धर्म से अलग नहीं किया जा सकता है। उनके विचार में, धर्मनिरपेक्ष राजनीति की कल्पना नहीं की जा सकती।  लेकिन यहां यह ध्यान देने योग्य है कि गांधी जी का धर्म किसी धर्म विशेष के सिद्धांतों तक सीमित नहीं था, बल्कि विश्वव्यापी धर्म था। गांधी का धर्म, वास्तव में, विश्वव्यापी नैतिक सिद्धांतों का एक समूह था। उनके विचार में, इस ब्रहमांड के लिए परम ब्रह्म द्वारा निर्धारित नैतिक नियमों में अटूट विश्वास का नाम ही धर्म है। वह ऐसी मान्यता के साथ राजनीति को पवित्र करना चाहते थे। धर्म के विचार के बारे में, उन्होंने स्वयं कहा था, "धर्म का अर्थ हिंदू धर्म या इस्लाम के सिद्धांतों में विश्वास करना नहीं है, बल्कि इसका अर्थ है कि इस ब्रहमांड के प्रबंधन के लिए निर्धारित नैतिक नियमों में विश्वास करना है। राजनीति को ऐसे धर्म से अलग नहीं किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि, "सच्चाई के प्रति मेरी लग्न मुझे राजनीति के दायरे में खींच लाई है।"  मैं बिना किसी हिचकिचाहट और बड़ी विनम्रता के साथ कहता हूं कि जो लोग कहते हैं कि धर्म का राजनीति से कोई लेना-देना नहीं है, वे वास्तव में धर्म का अर्थ नहीं समझते हैं।

    7. उद्देश्य और साधन - गांधीजी ने अच्छे उद्देश्यों की उपलब्धि पर जोर देते हुए इस तथ्य का जोरदार समर्थन किया है कि अच्छे उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए अच्छे साधन भी आवश्यक हैं। गांधी की ने साधनों की तुलना बीज से की है। उनका मतलब था कि जैसा बीज होगा वैसा ही पौधे और उसके फल होंगे। इस प्रकार यदि साधन अच्छे नहीं हैं तो उद्देश्य अच्छे नहीं हो सकते। गांधीजी का विचार था कि उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए साधनों की नैतिकता आवश्यक थी।

    8. स्वतंत्रता के बारे में विचार - गांधीजी राष्ट्रीय स्वतंत्रता के इलावा व्यक्तिगत स्वतंत्रता को पहला स्थान देना चाहते थे। उन्होंने ऐसे विचारकों की निखेधी की जो राज्य को अधिकतम शक्ति देनेऔर व्यक्तिगत स्वतंत्रता के क्षेत्र को सीमित करने का समर्थन हैं। 1942 में, उन्होंने हरिजन पत्रिका में लिखा कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता का त्याग करके समाज का निर्माण संभव नहीं है। ऐसा करना व्यक्ति के मौलिक स्वभाव के विरुद्ध है। गांधी जी का विचार था कि व्यक्ति को अपनी स्वतंत्रता को प्राप्त करने और बनाए रखने के लिए महान बलिदान करने में संकोच नहीं करना चाहिए। गांधीजी का विचार था कि स्वतंत्रता की अनुपस्थिति का अर्थ व्यक्ति और राष्ट्र की मृत्यु है क्योंकि स्वतंत्रता के बिना किसी भी राष्ट्र या व्यक्ति किसी भी रूप में विकास नहीं कर सकता।

    9. स्वराज के बारे में विचार - स्वराज पर गांधीजी के विचारों के दो पहलू हैं। एक तो वह स्वराज का अर्थ मानते हैं कि स्वराज एक सकारात्मक विचार है। वे स्वराज को एक पवित्र शब्द मानते थे जिसको वेदों में भी वर्णित किया गया है। इस दृष्टिकोण से, उन्होंने स्वराज का अर्थ सभी प्रकार के बंधनों से मुक्ति के रूप में नहीं, बल्कि आत्म शासन और आत्म संयम के रूप में लिया। यह उनके स्वराज का आध्यात्मिक पहलू था। व्यावहारिक रूप में, उनका स्वराज से अर्थ था,  कि लोगों को अपनी इच्छा अनुसार अपने प्रयासों के माध्यम से अपने भाग्य का निर्माण करने में सक्षम होना चाहिए।  स्वराज पर अपने विचार व्यक्त करते हुए, उन्होंने 29 जनवरी, 1925 को 'यंग इंडिया ’में लिखा,“ मैं यह कहना चाहूंगा कि कुछ के हाथों में सत्ता के आने के साथ सच्चा स्वराज स्थापित नहीं होगा, बल्कि इस की तब स्थापना उस समय होगी जब सभी व्यक्तियों में शक्ति के दुरुपयोग को रोकने की क्षमता आ जाएंगी।

    10. लोकतंत्र के बारे में विचार - गांधीजी एक पूर्ण लोकतंत्रवादी थे। उनका दृढ़ विश्वास था कि लोकतंत्र की सफलता के लिए लोगों में सहिष्णुता, अनुशासन, विनम्रता और बलिदान की भावना की आवश्यकता है। लोकतंत्र में शासक द्वारा जनमत का सम्मान करना बहुत महत्वपूर्ण है। गांधीजी ने कहा कि उनका सपने का लोकतंत्र के विकेंद्रीकरण और अहिंसा के सिद्धांतों पर आधारित होगा।  ऐसे लोकतंत्र में लोगों को ज्यादा से ज्यादा स्वतंत्रता प्राप्त होगी और राजनीति की शक्ति को कुछ ही व्यक्तियों के हाथों में केंद्रित नहीं होने देना चाहते थें जो अपने हाथों से किरत करता है। 1924 बलगाम में काग्रेस के वार्षिक समागम में अपने प्रधानगी भाषण में उन्होंने कहा था कि मेरे विचार में वोट का अधिकार देने के लिए ना संपत्ति ना ही रुतबा मुख्य योग्यता होनी चाहिए, बल्कि इसका आधार किरत होना चाहिए।

    11. बहुमत के सिद्धांत का विरोध - गांधीजी को बहुमत के शासन में कोई विश्वास नहीं था। उन्होंने महसूस किया कि प्रचलित संसदीय लोकतंत्रीय प्रणाली लोगों कि बहुमत शासन नहीं करता बल्कि कुछ राजनीतिक दलों के प्रमुख नेता ही अपने विचारों के अनुसार शासन करते है। गांधीजी एक ऐसे लोकतंत्र के समर्थक थे जहां लोग आंतरिक रूप से स्वतंत्र हैं और सत्ता के दुरुपयोग को रोकने के लिए निडरता और क्षमता रखते हैं।

    12. प्रतिनिधि प्रणाली, संसदीय प्रणाली आदि के बारे में विचार - गांधीजी प्रतिनिधि लोकतांत्रिक प्रणाली के पक्ष में हैं। गांधीजी चुनाव के खिलाफ नहीं थे। उनके अनुसार, लोगों को उन उम्मीदवारों को चुनना चाहिए जो योग्य, अनुभवी निस्वार्थ और ईमानदार होने। गांधीजी वयस्क मताधिकार के समर्थक थे, लेकिन उनका कहना है कि केवल उस नागरिक को वोट का अधिकार मिलना चाहिए जो अपनी रोजी-रोटी आप को कमाता हो। दुसरे शब्दों में गांधीजी मजदूर मताधिकार के पक्ष में थे।

    13. पुलिस और सेना - गांधीजी के आदर्श राज्य में पुलिस और सेना का कोई स्थान नहीं है, लेकिन आज के राज्य में गांधीवादियों को पुलिस और सेना की आवश्यकता महसूस होती है।  गांधीवादियों के अनुसार, पुलिस और सेना के जवान अहिंसक होंगे, उनके पास हथियार होंगे लेकिन उनका उपयोग कम से कम होगा। पुलिस और सेना में कोई बदले की भावना नहीं होगी और इसका मुख्य उद्देश्य लोगों का कल्याण होगा।

    14. राष्ट्रवाद के बारे में विचार - गांधीजी एक सच्चे राष्ट्रवादी थे। उन्हें राष्ट्रवादी होने पर गर्व था। उनकी हार्दिक इच्छा थी कि प्रत्येक देश में प्रत्येक व्यक्ति एक सच्चा राष्ट्रवादी हो। लेकिन उनका राष्ट्रवाद संकीर्ण राष्ट्रवाद या मानवतावाद-विरोधी राष्ट्रवाद नहीं था। उनका विचार था कि राष्ट्रवाद का मानवतावाद या किसी अन्य देश के हितों से कोई विरोध नहीं है। उनके विचार में, प्रत्येक व्यक्ति का यह महत्वपूर्ण कर्तव्य है कि देशभक्त और राष्ट्रवादी हो। उनका यह मत था कि राष्ट्रवाद किसी भी राष्ट्र को अन्य राष्ट्रों को अपने अधीन करने का अधिकार नहीं देता है, यही कारण है कि उनहोंने साम्राज्यवाद और बस्तीवाद का घोर विरोध किया।

    15. अंतर्राष्ट्रीयतावाद के बारे में विचार - गांधीजी एक राष्ट्रवादी होने के साथ साथ अंतर्राष्ट्रीयतावादी भी थे। उनका राष्ट्रवाद न तो मानव-विरोधी था और न ही राष्ट्रों के प्रति घृणा का प्रतीक था। उनका मानना ​​था कि एक राष्ट्रवादी हुए बिना कोई अंतरराष्ट्रीय नहीं बना जा सकता है।  इस संबंध में उन्होंने कहा था कि "मेरी राय में, राष्ट्रवादी बने बिना किसी के लिए भी अंतर्राष्ट्रीयवादी बनना असंभव है।" अंतर राष्ट्रवाद तभी संभव हो सकता है। जब राष्ट्रवाद एक वास्तविकता बन जाए।

    गांधीजी का अंतर-राष्ट्रवाद वास्तव में मानवतावाद था।  उनके इस कथन से यह सत्य स्पष्ट होता है। उनहोंने कहा था कि "मैं भारत की समृद्ध चाहता हूं, ताकि दुनिया को इससे फायदा हो सके। मैं अन्य राष्ट्रों को नष्ट करके भारत की समृद्धि नहीं चाहता हूँ। मैं उस देशभक्ति को अस्वीकार करता हूं जो अन्य राष्ट्रीयताओं की परेशानियों और शोषण को प्रोत्साहित करती है।

    16. अमीरों से जबरदस्ती धन छीनने का विरोध - गांधीजी का दृढ़ विश्वास था कि यदि सभी लोगों के पास उतनी ही संपत्ति है जितनी उन्हें जरूरत है, तो समाज में भूख और गरीबी नहीं होगी और सभी को संतोषजनक जीवन जीने का अवसर मिलेगा। लेकिन गांधीजी के सामने समस्या यह थी कि अमीरों से अतिरिक्त धन कैसे लिया जाए। कम्युनिस्ट विचारधारा ने इस संबंध में एक तरीका सुझाया, लेकिन गांधीजी उस पद्धति से सहमत नहीं थे। कम्युनिस्ट सिद्धांत के अनुसार, पूंजीपति और बड़े जमींदारों को एक क्रांति द्वारा उनकी संपत्ति से वंचित किया जा सकता है और उस तरह से स्थापित सरकार पूंजीपतियों के वर्ग को पूरी तरह से समाप्त कर सकती है। यह विधि हिंसा का उपयोग करती है। लेकिन गांधीजी का विचार था कि हिंसक कृत्यों द्वारा पूंजीपति वर्ग को समाप्त करने से समाज को कोई विशेष लाभ नहीं होगा। समाज ऐसे लोगों की श्रेणी से वंचित रह जाएगा जिनके पास अपनी बुद्धि के माध्यम से धन एकत्र करने की कला है। इसके अलावा, गांधीजी का विचार था कि सत्ता ग्रहण करने के बाद कार्यकर्ताओं में विभाजन की संभावना थी। इसलिए, गांधीजी ने समाज में धन के वितरण को समाप्त करने के लिए कम्युनिस्ट सिद्धांत पर विश्वास नहीं किया। इस उद्देश्य के लिए उन्होंने अपना स्वयं का सिद्धांत प्रस्तुत किया जिसे अमानतदारी प्रणाली (Trusteeship System) कहा जाता है।

    17. अमानतदारी प्रणाली - अमानतदारी प्रणाली की एक बहुत ही सरल व्याख्या है कि अमीर लोगों को यह एहसास कराने के लिए है कि उनके पास जो अतिरिक्त धन और संपत्ति है वह उनके खुद के किरत का नहीं बल्कि अन्य लोगों की मेहनत का फल है। उनकी संपत्ति पूरे समाज की संपत्ति है और वे स्वयं इस धन और संपत्ति के लिए समाज के एकमात्र अमानतदार ही हैं। अमीर लोग उस धन और संपत्ति के मालिक नहीं हैं, बल्कि उनकी स्थिति केवल अमानतदारो की है। उतने ही पैसे और संपत्ति रखनी चाहिए  जितना कि उन्हें अपनी सामान्य जरूरतों के लिए चाहिए, और बाकी पैसे और संपत्ति का उपयोग समाज के हित के लिए करना चाहिए। गांधीजी का दृढ़ विश्वास था कि अमानतदारी के सिद्धांत को व्यवहार में लाने के लिए, अहिंसा का उपयोग करना आवश्यक है। गांधी जी का यह सिद्धांत मानवीय निर्णय और मानवीय अहसास पर आधारित है।

    18. रोटी के लिए किरत - गांधीजी ने हाथ से किरत को विशेष महत्व दिया। वह एक दृढ़ विश्वास था कि प्रत्येक व्यक्ति को अपनी रोटी कमाने के लिए थोड़ी बहुत किरत अवश्य करनी चाहिए। गांधीजी के विचार में वह लोग चोर होते हैं जो बिना मेहनत के अपना पेट पालते हैं। गांधीजी के विचार में, हाथ से किरत का इतना महत्व था कि उन्होंने मानसिक काम करने और बुद्धिजीवियों को शारीरिक मेहनत करने के लिए कहा।  गांधी जी ने उन्हें सूत कातने के साथ या किसी अन्य हस्तकला में काम करके अपना जीवन निर्वाह करने के लिए कमाना। गांधीजी ने मानसिक मेहनत को समाज के लिए बहुत फायदेमंद माना लेकिन उनका विचार था कि रोज़ी कमाने  के लिए शारीरिक मेहनत अवश्य करनी चाहिए।

    19. राजनीतिक विकेंद्रीकरण - गांधीजी ने राज्य के प्रभुत्वशाली रूप की निंदा की और जोर दिया कि शक्तियों का कोई केंद्रीयकरण नहीं होना चाहिए। गांधीजी ने राजनीतिक विकेंद्रीकरण पर जोर दिया है। राजनीतिक विकेंद्रीकरण का अर्थ है कि ग्राम समुदायों को अपने मामलों का प्रबंधन करने के लिए पर्याप्त स्वतंत्रता दी जाती है और उन पर राष्ट्रीय या संघीय सरकार का नियंत्रण पूरी तरह से कम कर देना चाहिए। गांधीजी ग्रामीण संप्रदायों को अधिक स्वतंत्रता देकर आत्मनिर्भर इकाइयां बनाना चाहते थे।  गांधीजी राजनीतिक विकेंद्रीकरण के माध्यम से ग्राम पंचायतों को अधिक अधिकार देना चाहते थे ताकि जनता सीधे शासन के काम में भाग ले सके।  गांधीजी चाहते थे कि राजनीतिक सत्ता लोगों द्वारा खुद प्रयोग की जाए, न कि उनके प्रतिनिधियों द्वारा।

    20. आर्थिक विकेंद्रीकरण - गांधीजी के आदर्श राज्य में न केवल राजनीतिक विकेंद्रीकरण होगा, बल्कि आर्थिक विकेंद्रीकरण भी उनके आदर्श राज्य की एक महत्वपूर्ण विशेषता होगी। आर्थिक विकेंद्रीकरण से, गांधीजी का मतलब बड़े पैमाने के उद्योगों को समाप्त करना और उनके स्थान पर कुटीर उद्योगों की स्थापना करना था। गांधीजी औद्योगीकरण के पक्ष में नहीं थे क्योंकि उनका मानना ​​था कि बड़े पैमाने के उद्योगों का विकास मानव स्वतंत्रता को नष्ट कर देता है। गांधीजी के अनुसार, बड़े पैमाने पर उद्योगों की स्थापना व्यक्तिगत जीवन को नीरस बनाती है और साथ ही राज्य की शक्ति को बढ़ाती है। गांधीजी का यह भी विचार था कि बड़े पैमाने पर औद्योगिक विकास से हिंसा बढ़ी है और पश्चिमी संस्कृति की बहुत सारी बुराइयाँ औद्योगिक विकास का परिणाम हैं। बस्तीवाद, समाजवाद, अंतर्राष्ट्रीय शत्रुता आदि औद्योगिक विकास के परिणाम हैं।  गांधीजी का आदर्श राज्य अहिंसा और आध्यात्मिक मूल्यों पर आधारित होगा।  गांधीजी का विचार था कि उनका राज्य बड़े उद्योगों के अस्तित्व के साथ मेल नहीं खाता। किसी कारण से गांधीजी ने अपने आदर्श राज्य में आर्थिक विकेंद्रीकरण पर जोर दिया और बड़े उद्योगों के बजाय घरेलू उद्योगों को पहल दी।

    दोस्तों अगर आपको हमारी जानकारी अच्छी लगी तो आप इसे शेयर करे और किसी भी प्रकार की जानकारी के लिए कमेंट करें और हमें फालो कर ले ताकि आपको हमारी हर पोस्ट की खबर मिलती रहे।

    भारतीय संविधान की मुख्य विशेषताएं

    भारतीय संविधान का निर्माण - भारत के संविधान का निर्माण संविधान सभा द्वारा किया गया था, जिसे आजादी से पहले एक ब्रिटिश योजना के अनुसार स्थापित किया गया था। इस संविधान सभा में ब्रिटिश भारत के प्रांतों और भारत के राज्यों के प्रतिनिधि शामिल थे। इस संविधान सभा के प्रधान डॉ राजिंदर प्रसाद थे, जिन्हें संविधान सभा के सदस्यों द्वारा चुना गया था। ब्रिटिश योजना के अनुसार स्थापित, यह संस्था सीधे लोगों द्वारा नहीं चुनी गयी थी, बल्कि अप्रत्यक्ष रूप से जनप्रतिनिधियों द्वारा चुनी गयी थी।  स्वतंत्रता से पहले, संविधान सभा अपनी इच्छा के अनुसार संविधान का निर्माण करने के लिए स्वतंत्र नहीं थी, लेकिन 15 अगस्त, 1947 के बाद यह संस्था संंविधान तैयार करने के लिए संप्रभुता संपंन हो गई। इस संविधान सभा ने डॉ बी आर अंबेडकर की अगवाई में संविधान तैयार करने के लिए एक मसौदा समिति (Drafting Committe) का गठन किया था। मसौदा समिति द्वारा प्रस्तुत संविधान पर संविधान सभा द्वारा बहस की गई और बहस के बाद, यह संविधान को 26 नवंबर, 1949 को भारत की संविधान सभा द्वारा अपनाया गया था। लेकिन संविधान सभा ने 26 जनवरी 1950 से स्वतंत्र भारत के संविधान को लागू करने का फैसला किया। उन्होंने 26 जनवरी को इस लिए चुना क्योंकि 1930 से भारतीय हर साल 26 जनवरी को स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाते रहे हैं। 26 जनवरी को उस ऐतिहासिक दिन की याद को बनाए रखने के लिए चुना गया था।

    भारतीय संविधान की मुख्य विशेषताएं

    संविधान की मुख्य विशेषताएं

    भारतीय संविधान की मुख्य विशेषताएं इस प्रकार हैं:-

    1. लिखती और विस्तृत संविधान - भारत का संविधान एक लिखित संविधान है, जिसमें कुल 395 अनुच्छेद और 12 अनुसूचियां हैं। संविधानिक सोध के द्वारा संविधान में चाहे अनेक अनुच्छेद खारिज किए गए हैं और अनेक नयें  अनुच्छेद अंकित किए गए हैं परंतु अनुच्छेदों की क्रमबद्धता उसी तरह रखी गई है और अनुच्छेद की गणना में भी कोई परिवर्तन नहीं किया गया है। भारत का संविधान 22 भागों में विभाजित है। भारत का संविधान दुनिया में सबसे विस्तृत संविधान है। भारतीय संविधान का विस्तृत होने का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि संयुक्त राज्य अमेरिका के संविधान में 7, स्विट्जरलैंड के संविधान में 123 और जापान के संविधान में 103 अनुच्छेद है जबकि भारत के संविधान में अनुच्छेदों की संख्या 395 है।

    2. संविधान की शुरुआत से पहले प्रस्तावना - संविधान के पहले लेख से पहले प्रस्तावना अंकित की गयी है। हालांकि कुछ लोग कहते हैं कि प्रस्तावना संविधान का हिस्सा नहीं है। लेकिन असल में सच्चाई यह है कि भारतीय संसद ने और भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने प्रस्तावना को संविधान का एक हिस्सा माना है। प्रस्तावना में भी तबदीली उस विधि द्वारा ही कर सकती है जिस विधि द्वारा संसद में अन्य अनुच्छेदों में तबदीली करती है।

    3. कई साधनों से लिया अनोखा संविधान - हमारे संविधान निर्माता कोई मूलिक दस्तावेज बनाने के इच्छुक नहीं थे, लेकिन उनका एकमात्र उद्देश्य था एक ऐसा संविधान बनाना था जो व्यवहार रुप से एक आदर्श संविधान साबित हो। इसके लिए, संविधान के निर्माताओं ने भारतीय संविधान में दुनिया के कई देशों के संविधानों के अच्छे सिद्धांतों को शामिल करने में संकोच नहीं किया है, यही कारण है कि भारतीय संविधान को कई स्रोतों से लिया एक अनोखा संविधान है। कुछ मुख्य सिधांत जो विदेशी संविधानों से लिए गए है। उनका संक्षिप्त विवरण नीचे दिया गया है -

    (i) संसदीय प्रणाली ब्रिटिश प्रणाली की देन है।

    (ii) हमारे मौलिक अधिकारों और सर्वोच्च न्यायालय के कार्ज प्रणाली पर संयुक्त राज्य अमेरिका के संविधान का प्रत्ख प्रभाव है।

    (iii) राज्य की नीति के निरदेशक सिद्धांत आयरलैंड के संविधान से लिए गए हैं।

    (iv) कनाडा के संघीय संविधान का भारतीय संघीय संगठन पर गहरा प्रभाव है।

    (v) दक्षिण अफ्रीकी संविधान में से संविधान में संशोधन करने की प्रक्रिया और राज्य सभा के सदस्यों के चुनाव की प्रक्रिया पर प्रत्ख प्रभाव है।

    (vi) भारत के राष्ट्रपति के आपातकालीन शक्तियों जर्मनी के वाईमर (Weimer) संविधान के अनुच्छेद 48 का एक अभिन्न अंग हैं।

    (vii) उपरोक्त प्रभावों के अलावा, भारत सरकार द्वारा भारत के संविधान पर 1935 के अधिनियम का गहरा प्रभाव स्पष्ट प्रतीत होता है।

    4. मौलिक अधिकार - भारत के संविधान का भाग III में, अनुच्छेद 14 से 32 के तहत भारतीयों को मौलिक अधिकार प्रदान किये गए है। इन अधिकारों को छह श्रेणियों में बांटा गया है। ये अधिकार इस प्रकार हैं -

    (i) समानता का अधिकार (Rights to Equality) - अनुच्छेद 14 से 18।

    (ii) स्वतंत्रता का अधिकार (Rights to Freedom) - अनुच्छेद 19 से 22।

    नवंबर, 2002 में संसद द्वारा पास की और दिसंबर, 2002 में लिए राष्ट्रपति द्वारा प्रवानित 86 वीं सोध द्वारा शिक्षा के अधिकार के रुप में अनुच्छेद 21A के तहत एक मौलिक अधिकार में अंकित किया गया था। शिक्षा का अधिकार 'स्वतंत्रता का अधिकार' वाले भाग में एक नए अनुच्छेद 21A के द्वारा अंकित किया है।

    (iii) शोषण के खिलाफ अधिकार (Rights Against Exploitation) - अनुच्छेद 23 और 24।

    (iv) धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार (Right to Religious Freedom) - अनुच्छेद 25 से 28।

    (v) सांस्कृतिक और शैक्षिक अधिकार (Cultural and Educational Rights) - अनुच्छेद 29 से 30।

    (vi) संवैधानिक उपचारों का अधिकार (Right to Constitutional Remedies)- अनुच्छेद 32।

    5. संपत्ति का अधिकार एक साधारण अधिकार - भारतीय नागरिकों का संपत्ति का अधिकार 19 जून, 1979 तक एक मौलिक अधिकार था। लेकिन उस तारीख के बाद से नागरिकों का यह अधिकार एक सामान्य अधिकार बन गया है यानी कानूनी अधिकार बन गया, क्योंकि 44 वें संशोधन द्वारा संपत्ति के अधिकार को मौलिक अधिकार की सूची में से निकालकर इस अधिकार को संविधान के अनुच्छेद 300-A में अंकित करके एक कानूनी अधिकार बनाया गया है और यह प्रावधान किया गया है कि किसी भी व्यक्ति को कानून की शक्ति के बिना उसकी संपत्ति से वंचित नहीं किया जा सकता है।

    6. मौलिक कर्तव्य - भारतीय संविधान में निम्नलिखित 11 मौलिक कर्तव्य भारत के संविधान में अंकित हैं -

    (i) संविधान की पालना करना और इसके आदर्शों, इसकी संस्थाओं, राष्ट्रीय झंडे और राष्ट्रीय का सम्मान करना।

    (ii) उन सभी आदर्शों का आदर और पालना करनी, जिन शुभ आदर्शों ने स्वतंत्रता के लिए हमारे राष्ट्रीय संघर्ष को प्रेरित किया।

    (iii) भारत की संप्रभुता, एकता और अखंडता का समर्थन और रक्षा करनी।

    (iv) देश की रक्षा करना और जरूरत पड़ने पर राष्ट्रीय सेवा करना

    (v) धार्मिक, भाषाई, क्षेत्रीय और इसी तरह के मतभेदों से ऊपर उठकर, भारत के सभी लोगों के बीच समान भाईचारे की भावना विकसित करने और महिलाओं की गरिमा का अपमान करने वाली प्रथाओं को त्यागना।

    (vi) संयुक्त संस्कृति की समृद्ध विरासत का सम्मान करना और उसे कायम रखना।

    (vii) वनों, झीलों, नदियों और वन्य जीवन, प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा और सुधार करना और जानवरों के प्रति दया दिखाना।

    (viii) वैज्ञानिक स्वभाव, मानवतावाद और जांच करन के सुधार की भावना विकसित करना।

    (ix) सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा करना और हिंसा का त्याग करना।

    (x) व्यक्तिगत और सामूहिक गतिविधि के हर क्षेत्र में उत्कृष्टता के लिए प्रयास करना ताकि राष्ट्र उपलब्धि के उच्च स्तर तक बढ़ता रहे।

    (xi) दिसंबर, 2002 में लागू की गयी 86वीं संविधानिक संशोधन द्वारा नागरिकों के एक और मौलिक कर्तव्य को संविधान में शामिल किया गया है। इस संवैधानिक संशोधन द्वारा यह वयवस्था की गयी है कि बच्चों के माता-पिता या अभिभावकों का यह मौलिक कर्तव्य है कि वे अपने बच्चों को ऐसी परिस्थितियों में अवसर प्रदान करें, जिससे बच्चे शिक्षा प्राप्त कर सके। परिणामस्वरूप, मौलिक कर्तव्यों की कुल संख्या 11 हो गई।

    7. राज्य की नीति के निर्देशक सिद्धांत - भारतीय संविधान के भाग IV में अनुच्छेद 36 से 51 तक राज्य की नीति के निर्देशक सिद्धांतों का वर्णन किया गया हैं। राज्य की नीति के यह मूल सिद्धांत शासन की अगवाई करन और सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र की स्थापना करने के लिए संविधान में अंकित किये गये है। 

    ये निर्देशक सिद्धांत न्याय योग नहीं हैं। इसका मतलब यह है कि सिद्धांतों को लागू करने के लिए किसी भी अदालत की शरन नहीं ली जा सकती। यदि कोई सरकार उन्हें लागू नहीं करती है, तो इसके खिलाफ किसी भी अदालत में कोई कार्रवाई नहीं की जा सकती है।

    8. प्रभुसत्ता संपन्न समाजवादी धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक गणराज्य - प्रस्तावना में भारत को एक संप्रभुताशाली समाजवादी धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक गणराज्य घोषित किया गया है।

    (i) भारत एक प्रभुताशाली राज्य है क्योंकि यह किसी भी विदेशी शक्ति के अधीन नहीं है और अपनी आंतरिक और बाहरी नीति बनाने के लिए पूरी तरह से स्वतंत्र है।

    (ii) भारत एक धर्म निरपक्ष राज्य है क्योंकि भारतीय संविधान में किसी विशेष धर्म को राज धर्म की मान्यता नहीं दी गई है और सभी भारतीयों को धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार दिया गया है।

    (iii) भारत एक लोकतांत्रिक राज्य है क्योंकि संविधान ने बालग मताधिकार के आधार पर आवधिक चुनावों के लिए प्रावधान किया है। 18 वर्ष से अधिक आयु के सभी व्यक्तियों को मतदान का अधिकार है। 25 वर्ष या उससे अधिक आयु के प्रत्येक व्यक्ति को लोकसभा और राज्य विधानसभा चुनाव लड़ने का अधिकार दिया गया है।  इस आधार पर, हमारे देश में अब तक 15 आम चुनाव हुए हैं। 15वीं लोकसभा के चुनाव अप्रैल-मई 2009 में हुए थे और 16वीं लोकसभा के चुनाव मई 2014 में हुए थे। इसके इलावा संविधान में मौलिक अधिकारों का प्रावधान भी भारतीय संविधान के लोकतांत्रिक स्वरूप का प्रतीक है।

    (iv) भारत एक गणतंत्र है क्योंकि इसका राष्ट्रपति अप्रत्यक्ष रूप से जनप्रतिनिधियों द्वारा चुना जाता है और उसकी शक्तियों का स्रोत भारतीय लोगों द्वारा बनाया गया सर्वोच्च संविधान है।

    (v) हालाँकि भारत को प्रस्तावना में एक समाजवादी गणराज्य कहा जाता है, यह वास्तव में एक समाजवादी गणराज्य नहीं है क्योंकि भारतीय संविधान में समाजवाद के महत्वपूर्ण सिद्धांत प्रदान नहीं किए गए हैं।

    9. संसदीय शासन प्रणाली - संविधान भारत में संसदीय शासन प्रणाली की व्यवस्था की गयी है। यह तथ्य संविधान के निम्नलिखित व्यवस्थाओं से स्पष्ट है।

    (i) संविधान के नाममात्र के कार्यकारी और असली कार्यकारी दोनों की व्यवस्था की गयी है। राष्ट्रपति भारत की नाममात्र की कार्यकारी है और प्रधान मंत्री की अध्यक्षता वाली मंत्रिपरिषद असली कार्यकारी है। राष्ट्रपति अपने मंत्रिमंडल की सलाह पर कार्य करता है। भारतीय संविधान में स्पष्ट व्यवस्था है कि राष्ट्रपति के लिए मंत्री परिषद की सलाह को स्वीकार करना महत्वपूर्ण है।

    (ii) मंत्रिपरिषद अपनी नीतियों और कार्यों के लिए संसद के निचले सदन, अर्थात लोकसभा के प्रति जवाबदेह है।

    (iii)  मंत्री परिषद अपनी पदवी पर उस समय तक कायम रह सकता है जब तक उसको लोकसभा का विश्वास प्राप्त हो।

    (iv) लोकसभा अविश्वास प्रस्ताव पारित करके, मंत्रिपरिषद को निर्धारित समय से पहले इस्तीफा देने के लिए मजबूर कर सकती है। ऐसी स्थितियाँ सरकार की संसदीय प्रणाली का साकार रूप हैं।

    10. कठोर और लचीला संविधान - सिद्धांतक रूप में, भारतीय संविधान एक कठोर है। सिद्धांतक तौर पर एक कठोर संविधान वह है जिसमें संशोधन के लिए एक विशेष प्रक्रिया निर्धारित की जाती है। इस संबंध में, भारत का संविधान एक कठोर संविधान है क्योंकि संविधान का अनुच्छेद 368 एक विशेष संवैधानिक संशोधन प्रक्रिया निर्धारित करता है।  इस संशोधन के माध्यम से अब तक 94 संवैधानिक संशोधन किए गए हैं। एक कठोर संविधान की एक और विशेषता यह है कि यह आम कानून का निरमाण करने के लिए एक अलग प्रक्रिया निर्धारित करता है। इस संबंध में भी, भारतीय संविधान कठोर संविधान है क्योंकि भारत का संविधान, संविधान में संशोधन के लिए एक अलग प्रक्रिया और आम कानूनों को लागू करने के लिए एक अलग प्रक्रिया निर्धारित करता है।

    संविधान में संशोधन के उद्देश्य से भारत के संविधान को तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है।

    (i) एक भाग वह है जिसे संसद द्वारा केवल एक साधारण बहुमत से बदला जा सकता है। यह भाग संविधान के लचीलेपन को बताया है।

    (ii) दूसरा भाग वह है जिसे संसद के दोनों सदनों में कुल संख्या का स्पष्ट बहुमत और हाजर मतदाताओं का दो तिहाई बहुमत पक्ष में होना आवश्यक है। यह भाग संविधान की कठोरता का स्पष्ट प्रमाण है।

    (iii) तीसरा भाग वह है, जिसे बदलने के लिए संसद के दोनों सदनों में कुल सदस्यों की कुल संख्या का स्पष्ट बहुमत और हाजर और मतदान करने वाले दो-तिहाई बहुमत के अलावा कम से कम आधे राज्य विधान मंडलों के समर्थन भी जरूरी होती है। यह भाग संविधान के अति कठोर होने का सबूत है।  इस प्रकार यह स्पष्ट है कि भारतीय संविधान न तो बहुत कठोर है और न ही अधिक लचीला है, बल्कि कठोरता और लचीलेपन का मिश्रण है।

    11. संघीय प्रणाली - भारतीय संविधान में 'संघ' (Federation) शब्द का उपयोग नहीं किया गया है। पहले अनुच्छेद में, भारत को 'राज्यों का संग्रह' (Union of States) घोषित किया गया है। हालांकि, कुछ लेखकों की राय है कि भारत का संविधान संघ सरकार की स्थापना करता है क्योंकि इसमें सभी तत्व शामिल हैं जो संघीय सरकार में मौजूद होने जरूरी है। संविधान ने दोहरी शासन प्रणाली की व्यवस्था की है।  भारतीय संविधान में केंद्रीय सरकार के अलावा 28 राज्यों की व्यवस्था की गई है। संघात्मक प्रणाली के सिद्धांतों के अनुसार, संविधान द्वारा केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों को विभाजित किया है।  इसके अलावा संविधान की सर्वोच्चता, लिखती और कठोर संविधान, स्वतंत्र न्यायपालिका और दो सदनी विधान मंडल की होंद भी भारतीय संविधान की संघात्मक विशेषताएं हैं।

    12. एकात्मक विशेषताएं - भारतीय संविधान में कुछ एकात्मक तत्व भी हैं। उदाहरण के लिए, शक्तियों का बाँट केंद्र को बहुत शक्तिशाली बनाती है। महत्वपूर्ण विषय संघ सूची में अंकित हैं और इसके अलावा बची शक्तियां भी केंद्र को दी गई हैं। एकहिरी नागरिकता, एकीहिरी संगठित न्यायपालिका, राष्ट्रपति की आपातकालीन शक्तियाँ आदि भी एकतमकता के प्रतीक हैं।

    13. धर्मनिरपेक्ष राज्य - संविधान की प्रस्तावना में, भारत को धर्मनिरपेक्ष गणराज्य घोषित किया गया है। संविधान में इस तरह के प्रावधान किए गए हैं जो एक धर्मनिरपेक्ष राज्य की आवश्यक विशेषताएं हैं। संविधान किसी विशेष धर्म को राज्य धर्म का दर्जा नहीं दिया है और सभी धर्मों के लोगों के साथ समान माना करता है।

    भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 से 28 धार्मिक स्वतंत्रता प्रदान करते हैं। हर कोई अपनी पसंद के किसी भी धर्म को अपना और उसका प्रचार करने के लिए स्वतंत्र है। धार्मिक संस्थानों को धार्मिक प्रचार के लिए संपत्ति आदि रखने और उसका प्रबंधन करने की स्वतंत्रता है। सरकारी पदों पर नियुक्तियाँ के समय किसी नागरिक के साथ धर्म के आधार पर कोई मतभेद नहीं किया जा सकता है। धर्म एक व्यक्तिगत मामला है और राज्य इसमें दखलंदाजी करने से संकोच करता है। भारत की धर्मनिरपेक्षता व्यावहारिक रूप से स्पष्ट प्रतीत होती है। भारत के राष्ट्रपति के रूप में दो मुसलमान, लगातार 10 वर्षों तक प्रधान मंत्री के रूप में एक सिख, भारतीय थल सेना के प्रमुख के रूप में दो सिख और एक इतालवी महिला का कांग्रेस का प्रधान होना आदि भारत के धर्मनिरपेक्षता के व्यावहारिक उदाहरण हैं।

    14. दो सदनीय विधानमंडल - संविधान ने केंद्र में दो सदनीय विधानमंडल की व्यवस्था की है। एक सदन को लोकसभा और दूसरे सदन को राज्य सभा कहा जाता है। लोक सभा सभी मतदाताओं की और राज्य सभा राज्यों का प्रतिनिधित्व करती है। लोकसभा का चुनाव लोगों द्वारा पाँच वर्षों के लिए किया जाता है। राज्यसभा एक स्थाई सदन है और इसके मेंबरों को 6 साल के लिए चुने जाते है, लेकिन एक तिहाई हर एक-दो साल मगर से रिटायर हो जाते हैं। लोकसभा को पांच साल के कार्यकाल से पहले भंग नहीं किया जा सकता है, लेकिन राज्य सभा को सदन के रूप में भंग नहीं किया जा सकता। 

    15. एकीहिरी संगठित न्यायपालिका - भारत चाहे एक संघात्मक राज्य है, लेकिन यहाँ केंद्र और राज्य सरकारों के कानूनों के अनुसार न्याय के लिए केंद्र और राज्यों के लिए अलग अदालतों की व्यवस्था नहीं की है। भारत में एकहिरी संगठित न्याय प्रणाली की व्यवस्था की है। न्यायिक संगठन में सर्व उच्चतम न्यायालय सबसे ऊंची न्यायालय है और इसके नीचे राज्यों की उच्च न्यायालय हैं।

    16. स्वतंत्र न्यायपालिका - सुप्रीम कोर्ट और उच्च न्यायालयों की व्यवस्था करने समय, संविधान निर्माताओं ने उन सभी सिद्धांतों को अपनाने की कोशिश की है जो एक स्वतंत्र न्यायपालिका के लिए आवश्यक हैं। न्यायाधीशों को नियुक्त करने की शक्ति विधान मंडल या जनता को नहीं दी गयी, बल्कि यह अधिकार राष्ट्रपति को दिया गया, जो मुख्य न्यायाधीश और कुछ अन्य न्यायाधीशों की सलाह पर न्यायाधीशों की नियुक्ति करता है। जब केंद्रीय संसद न्यायिक नियुक्ति आयोग अधिनियम पास करती है, तो सुप्रीम कोर्ट और राज्य उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों की नियुक्ति और राज्यों के उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों के परिवर्तन, न्यायिक नियुक्ति आयोग की सिफारिशें  के अनुसार होगा। न्यायाधीशों का कार्यकाल भी एक निश्चित आयु पर आधारित होता है। सर्व उच्च न्यायालयों के न्यायाधीश 65 वर्ष की आयु और राज्यों के उच्च न्यायालयों के न्यायाधीश 62 वर्ष की आयु में रिटायर होते हैं। न्यायाधीशों का वेतन और भत्ते भी काफी अधिक हैं।  न्यायाधीशों के लिए योग्यता भी बहुत अधिक है। हमारा मतलब है कि एक स्वतंत्र न्यायपालिका के सभी सिद्धांत भारतीय संविधान में अपनाये गये हैं।

    17. संविधान की सर्वोच्चता और न्यायिक समीक्षा का अधिकार - हालाँकि संविधान का कोई भी अनुच्छेद स्पष्ट रूप से संविधान की सर्वोच्चता और न्यायिक समीक्षा का अधिकार नहीं बताता है, लेकिन ये दो तथ्य हमारे संविधान की मुख्य विशेषताएं हैं। भारत सरकार के प्रत्येक अंग को और प्रत्येक संवैधानिक अधिकारी को शक्तियां संविधान द्वारा दी गयी हैं। वे संविधान के बाहर किसी भी शक्ति का उपयोग नहीं कर सकते। यह सत्य साबित करता है कि भारत का संविधान सर्वोच्च है और भारत में किसी व्यक्ति का शासन नहीं है, बल्कि कानून का शासन है। संविधान की सर्वोच्चता तभी बनी रह सकती है, जब न्यायपालिका के पास न्यायिक समीक्षा की शक्ति हो। इस अधिकार के तहत, सर्वोच्च न्यायालय या उच्च न्यायालयों को उन कानूनों या कार्यकारी आदेशों को रद्द करना होगा जो किसी भी तरह से संविधान का उल्लंघन करते हैं। ये सभी तथ्य संविधान की सर्वोच्चता, भारत में कानून के शासन और भारतीय न्यायपालिका द्वारा न्यायिक समीक्षा के अधिकार के अस्तित्व की पुष्टि करते हैं।

    18. एकहिरी नागरिकता - भारत में संयुक्त राज्य अमेरिका की तरह दोहरी नागरिकता नहीं है, बल्कि एकहिरी नागरिकता है। इसका मतलब है कि भारत में किसी के पास राज्यों की नागरिकता नहीं है। हर व्यक्ति पूरे भारत का नागरिक हो सकता है। संयुक्त राज्य अमेरिका में, सभी को पहले उस राज्य की नागरिकता प्राप्त करनी होगी जिसमें वह पैदा हुआ है या रहता है, और साथ ही उसे संयुक्त राज्य अमेरिका की नागरिकता भी प्राप्त होती है। स्विट्जरलैंड में भी, दोहरी नागरिकता प्रदान की जाती है। लेकिन भारतीय संविधान में ऐसा कोई व्यवस्था नहीं है।

    19. बालग मताधिकार - भारत के संविधान ने एक अलग सांप्रदायिक चुनाव प्रणाली के बजाय एक संयुक्त चुनाव प्रणाली को अपनाया है। इसके इलावा, भारत का संविधान में बालग मताधिकार का सिद्धांत लागू किया गया है। 18 वर्ष या उससे अधिक आयु के प्रत्येक पुरुष और महिला को बिना किसी भेदभाव के मतदान का अधिकार दिया गया है। 

    अब तक 17 लोकसभा चुनाव इसी सिद्धांत के आधार पर हुए हैं। 16 वीं लोकसभा चुनाव मई 2014 में हुए थे और 17 वीं लोकसभा चुनाव अप्रैल मई 2019 में हुए हैं। भारत ने कुछ अनिवासी भारतीयों को मतदान का अधिकार देने की भी घोषणा की है।

    20. सभी उम्मीदवारों को अस्वीकार करने का अधिकार - 27 सितंबर, 2013 को सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक निर्णय में भारत में चुनावी प्रक्रिया में क्रांतिकारी परिवर्तन का आदेश दिया। सर्वोच्च अदालत के उस निर्णय द्वारा भारती मतदाताओं को यह तय करने का अधिकार दिया गया है कि अगर किसी मतदाता चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों में से यदि कोई उम्मीदवार पसंद नहीं आये तो वह सभी उम्मीदवारों को अस्वीकार करने के अपने अधिकार का प्रयोग कर सकता है। इस प्रयोजन के लिए, मतदाता को वोटिंग मशीन पर वह बटन दबाना पड़ता है जो कहता है कि "उपरोक्त में से कोई भी नहीं।" (None of the Above - NOTA)।  यह पहली बार है कि भारतीय मतदाताओं को एक ऐसा अधिकार दिया गया है जो भारतीय लोकतंत्र को सच्चा लोकतंत्र बनाने की शक्ति रखता है। राजनीतिक उम्मीदवारों को टिकट देते समय उम्मीदवार संबंधी गंभीरता से विचार करेंगे क्योंकि उनके द्वारा चुनाव के लिए खडा किया गया उम्मीदवार, मतदाताओं द्वारा अस्वीकार कर दिया जाता है, तो यह उस पार्टी के साथ-साथ रद्द किये जा रहे उम्मीदवार के लिए बहुत ही निराशाजनक स्थिति होगी।

    चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन किया और आवश्यक बदलाव किए। यदि किसी चुनाव क्षेत्र में इलेक्ट्रिक मशीनों के बजाय बैलेट पेपर का उपयोग किया जाता है, तो बैलेट पेपर पर एक बॉक्स होगा, जो कहेगा "उपरोक्त में से कोई नहीं।" (None of the Above - NOTA)। जो मतदाता सभी उम्मीदवारों को अस्वीकार करना चाहता है, वह इस बॉक्स में एक मुहर लगा सकता है। चुनाव आयोग ने यह स्पष्ट कर दिया था कि मतदाताओं ने सभी उम्मीदवारों को अस्वीकार करने के अपने अधिकार का प्रयोग किया, तब भी सबसे अधिक मत पाने वाले उम्मीदवार को ही विजेता घोषित किया जाएगा। सभी उम्मीदवारों को अस्वीकार करने के अपने अधिकार का प्रयोग करने वाले मतदाताओं को किसी भी उम्मीदवार के पक्ष में नहीं गिना जाएगा, बल्कि सभी उम्मीदवारों के खिलाफ गिना जाएगा। वोट का परिणाम विभिन्न उम्मीदवारों को प्राप्त मतों की वास्तविक संख्या के आधार पर होगा और मतदाताओं के वोट जिन्होंने सभी उम्मीदवारों को अस्वीकार कर दिया है, निर्णय में कोई भूमिका नहीं निभाएंगे। जिस उम्मीदवार को सबसे ज्यादा वोट मिले, उसे विजेता घोषित किया जाएगा।

    21. साँझी चुनाव प्रणाली - स्वतंत्रता-पूर्व भारत में, चुनावी प्रणाली सांप्रदायिक आधार पर चुनाव प्रणाली आधारित थी। मुस्लिम, सिख और कई अन्य जातियों के लिए स्थान निश्चित थे। उन स्थानों से उम्मीदवार केवल उस धर्म या वर्ग के ही हो सकते थे जिस धर्म या वर्ग के लिए स्थान निक्षचित थे और उन स्थानों से उस धर्म या वर्ग के लोग ही मतदान कर सकते थे जो उस धर्म या वर्ग से संबंधित थे। जिस धर्म या वर्ग के लिए स्थान राखवें थे। अगर मुस्लिमों के लिए कोई स्थान आरक्षित है, तो वहां मुस्लिम चुनाव लड़ सकता था और मुस्लिम ही वोटिंग कर सकते थे। लेकिन स्वतंत्र भारत में, इस तरह की सांप्रदायिक प्रणाली की जगह पर एक साँझी चुनावी प्रणाली कर दी गयी है। धर्म के आधार पर  कोई भी स्थान राखवां नहीं रखा गया, केवल अनुसूचित जाति, अनुसूचित वर्ग और अनुसूचित कबीले के लिए कुछ स्थान आरक्षित रखें गये है, उन स्थानों से चुनाव तो अनुसूचित जाति के उम्मीदवार ही लड सकते है। लेकिन वोट देने का अधिकार सभी को है।

    22. अनुसूचित जाति और पिछड़े कबीलों के लिए विशेष प्रावधान - समानता के अधिकार को असल में लागू करने के लिए, भारत के संविधान के द्वारा छूत छात को समाप्त कर दिया है। किसी भी रूप में छूत छात करना कानूनी अपराध है। इसके अलावा, संविधान अनुसूचित जातियों को कुछ विशेषाधिकार दिये गये है। संसद और राज्य विधानसभाओं में 2009 में पास एक कानून अनुसार 25 जनवरी 2020 तक अनुसूचित जातियों और पिछड़ी जातियों के लिए 84 और 47 स्थान आरक्षित किये गये हैं। इसी तरह, सरकारी नौकरियों में कुछ उनकी संख्या के अनुपात में कुछ स्थान आरक्षित किये गये है। इसके अलावा, संविधान लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में एंग्लो-इंडियन जाति के सदस्यों के नामांकन के लिए व्यवस्था की है।

    23. अनुसूचित जाति और अनुसूचित कबीलों के लिए राष्ट्रीय आयोग - मई 1990 में, संसद ने संविधान का 68वां संशोधन पास किया। इस संशोधन के तहत, संविधान ने अनुसूचित जाति और अनुसूचित कबीलों के लिए एक राष्ट्रीय आयोग की व्यवस्था की गयी, लेकिन जून 2002 में दोनों के लिए अलग-अलग आयोग गठित किए गए थे।  वर्तमान में अनुसूचित जातियों के हितों के विकास को सुनिश्चित करने के लिए एक अलग आयोग है जिस को "अनुसूचित जातियोंके लिए राष्ट्रीय आयोग" (National Commission for scheduled castes) और अनुसूचित कबीलों के हितों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए "अनुसूचित कबीलों के लिए  राष्ट्रीय आयोग" (National Commission for scheduled Tribes) कहा जाता है। इन दोनों आयोगों के अध्यक्ष और सदस्य राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त किए जाते हैं और ये दोनों आयोग अपने-अपने क्षेत्राधिकार के अनुसार अनुसूचित जातियों और कबीलों के हितों के विकास के लिए संविधान में किए गए प्रावधानों को लागू करने के लिए सरकार को आवश्यक सिफारिशें करते हैं।

    24. कुछ अन्य संवैधानिक आयोग - इन आयोगों के अलावा, संविधान निम्नलिखित आयोगों की भी व्यवस्था की है: 

    (1) चुनाव आयोग (Election Commission)

    (2) राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग (National Commission for Minorities)

    (3) राष्ट्रीय महिला आयोग (National Commission for Women)

    (4) संघ लोक सेवा आयोग (Union Public Service Commission)

    (5) राज्य लोक सेवा आयोग (State Public Service Commission)

    (6) सांझी लोक सेवा आयोग (Joint Service Commission)

    (7) महालेखा निरीक्षक (Comptroller and Auditor General)

    ये सभी आयोग अपने-अपने क्षेत्रों में अपने अधिकार क्षेत्र का उपयोग करते हैं।

    25. आपातकालीन शक्तियां - भारत का संविधान राष्ट्रपति को आपातकाल की स्थिति घोषित करने की शक्ति देता है। राष्ट्रपति निम्नलिखित परिस्थितियों में आपातकाल की स्थिति की घोषणा कर सकता है।

    (i) युद्ध, बाहरी हमले या सशस्त्र विद्रोह (Armed Rebellion) के कारण या इनमें से किसी के होने की संभावना के कारण।

    (ii) यदि राज्य में संवैधानिक प्रबंध असफल हो जाए या असफल होने की संभावना हो।

    (iii) देश को वित्तीय संकट का खतरा होने पर।

    इन परिस्थितियों में, राष्ट्रपति आपातकाल की स्थिति की घोषणा कर सकता हैं।

    26. हिंदी केंद्र सरकार की सरकारी भाषा है - भारत के संविधान में कुल 22 भाषाओं को मान्यता दी गई है और हिंदी को देवनागरी लिपि में केंद्र की सरकारी भाषा घोषित किया गया है। हिंदी के विकास के लिए केंद्र और राज्य सरकारों को विशेष जिम्मेदारी दी गई है ताकि हिंदी जल्द से जल्द अंग्रेजी की जगह ले सके। जहां पर यह वर्णनयोग है कि संविधानिक पक्ष से हिंदी को राष्ट्रीय भाषा का अधिकार दिया गया है। असल सचाई यह है कि कोई भी भाषा राष्ट्रीय भाषा नहीं है।

    27. स्थानिक स्तर के लोकतंत्र को संवैधानिक मान्यता - जड़ें स्तर दिसंबर 1992 में, भारत की संसद ने संविधान के 73 वें और 74 वें संशोधन को पास किया। 73वें संशोधन द्वारा पंचायतो संबंधी और 74वें संशोधन द्वारा शहर क्षेत्र की स्थानिक संस्थाओं संबंधी महत्वपूर्ण संवैधानिक व्यवस्था की गई। इन संशोधनों के लागू होने से पहले स्थानीय स्तर के लोकतांत्रिक संबंध में संविधान में कोई विशेष व्यवस्था नहीं थी। इन संशोधनों द्वारा ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में स्थानीय संस्थाओं के बारे संविधानिक व्यवस्थाओं किये जाने से हमारे देश में ग्रामीण और शहरी क्षेत्र के स्थानक लोकतंत्र को संविधानिक मानता प्राप्त हो गई।

    28. अंतर्राष्ट्रीयवाद - वर्तमान युग अंतर्राष्ट्रीयवाद का युग है। किसी भी देश के लिए अंतर्राष्ट्रीय दुनिया से बाहर अकेले रहना संभव नहीं है। यहां तक ​​कि सबसे बड़ा और सबसे शक्तिशाली देश, संयुक्त राज्य अमेरिका अपनी आवश्यकताओं के लिए अन्य राज्यों पर निर्भर करता है। हमारे भारतीय संविधान की भी अंतर्राष्ट्रीयवाद एक महत्वपूर्ण विशेषता है। यह विशेषता अनुच्छेद 51 से प्रगट होती है। अनुच्छेद 51 में यह व्यवस्था है कि -

    (i) राज्य अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा के विकास के लिए प्रयास करेगा।

    (ii) राज्य राष्ट्रों के बीच न्यायिक और सनमानयोग संबंध स्थापित करने का प्रयास करेगा।

    (iii) राज्य अंतर्राष्ट्रीय कानून और अंतर्राष्ट्रीय संधियों की जिम्मेदारी संबंधी सम्मान विकसित करने और संगठित लोगों के विहार में सुधार करने का प्रयास करेगा।

    (iv) राज्य अंतर्राष्ट्रीय विवादों को फैसलों के माध्यम से उत्साहित करने के लिए प्रयास करेगा।

    ये सभी व्यवस्थाएँ अंतर्राष्ट्रीयवाद की पुष्टि करती हैं। हमारे संविधान में इन व्यवस्थाओ को राज्य की नीति के निदेशक सिद्धांत के रूप में अंकित किया हैं। राज्य की नीति के निदेशक सिद्धांत न्याययोग नहीं हैं, इसलिए इन व्यवस्थाओं को अदालतों द्वारा लागू नहीं किए जा सकता। यहां यह उल्लेखनीय है कि अंतर्राष्ट्रीयवाद संबंधी ये व्यवस्था भारतीय संविधान की विशेषताएं तब हो सकती हैं, लेकिन किसी भी पक्ष से उन्हें भारतीय संविधान के मौलिक सिद्धांत कहना उचित नहीं होगा।

    29. राज्य सरकारों की व्यवस्था - भारतीय संविधान ने चाहे एक संघात्मक प्रणाली की व्यवस्था की है। जम्मू और कश्मीर राज्य के अलावा किसी भी राज्य के पास अलग संविधान होने का अधिकार नहीं है। भारत में 28 राज्य और 7 केंद्र शासित प्रदेश हैं। तेलंगाना के नए राज्य का फैसला केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा किया गया है। जब संसद तेलंगाना राज्य की स्थापना के लिए आवश्यक कानून पास करेंगी तो भारत में राज्यों की संख्या 29 हो जाएगी। केंद्र की तरह राज्यों की भी संसदीय शासन प्रणाली होती है।

    राज्य की नाममात्र कार्यपालिका की व्यवस्था गवर्नर के रूप में असली कार्यपालिका की व्यवस्था मुख्यमंत्री की अध्यक्षता अधीन मंत्रिपरिषद के रूप में की गयी है। छह राज्यों में दो सदनी विधानमंडल और बाकी के राज्यों में एक सदनी विधान मंडल की व्यवस्था की है। जहां विधान सभा के दो सदन है। वहाँ निचले सदन को विधान सभा ऊपर के सदन को विधान परिषद कहा जाता है। जिन राज्यों में विधान सभा का केवल एक सदन है, उस सदन को विधान सभा (Legislative Assembly) कहा जाता है।

    निष्कर्ष (Conclusion)

    भारतीय संविधान की मुख्य विशेषताओं पर विचार करने के बाद, हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि संविधान के निर्माताओं ने किसी विशेष मत या सिद्धांत के आधार पर संविधान का निर्माण नहीं किया था, बल्कि भारतीय परिस्थितियों के अनुसार, उनका उद्देश्य एक आदर्श संविधान बनाना था। हम पूरी तरह से एम. पी. शर्मा (M.P. Sharma) के दृष्टिकोण से सहमत हैं, "संविधान के निर्माताओं का उद्देश्य एक मौलिक या अद्भुत संविधान नहीं था, बल्कि वे एक अच्छा संविधान बनाना चाहते थे। हमारे विचार में, वह इस प्रयास में काफी हद तक सफल हुए हैं।

    दोस्तों अगर आपको हमारी जानकारी अच्छी लगी तो आप इसे शेयर करे और किसी भी प्रकार की जानकारी के लिए कमेंट करें और हमें फालो कर ले ताकि आपको हमारी हर पोस्ट की खबर मिलती रहे।

    Santa Banta Jokes & Chutkale in Hindi

    Santa Banta Jokes & Chutkale in Hindi

    Funny Santa Banta Jokes in Hindi

    बंता दुकान पर अंडरवियर खरीदने गया।
    दुकानदार ने बंता को अंडरवियर दिखाया।
    बंता ने दुकानदार से अंडरवियर का दाम पूछा।
    दुकानदार ने अंडरवियर का दाम 600 रूपये बताया।
    दाम सुनकर बंता बोला :-
    भईया पार्टीवियर नहीं लेना, घर में पहनने के हिसाब का दिखाओ। 🙂 🙂 🙂

     

    संता ने पूछा बंता से :-
    बंता भईया जिसको सुनाई नहीं देता, उसको क्या कहते हैं ?
    बंता बोला :- कुछ भी कह लो भईया जब उसे सुनाई ही नहीं देता। 😉 🙂 😉

     

    कौन बनेगा करोड़पति में अमिताभ बच्चन ने संता और बंता से एक सवाल पूछा।
    सवाल था :-
    अगर 8 का आधा कर दिया जाये तो क्या बचता हैं ?
    संता बोला :- 4
    बंता बोला :- गलत जबाब हैं, 4 नहीं बचता।
    अमिताभ बच्चन बोले :- फिर क्या बचता हैं ?
    बंता बोला :- 8 को vertically काटने पर 3 बचता हैं,
    और horizontally काटने पर 0 बचता हैं।
    अमिताभ बच्चन बेहोश 😉 😉 😉

     

    संता बड़ा परेशान था, बेचारे की शादी जो नहीं हो रही थी। हर बार शादी होते होते टूट जाती। सारे दोस्तों से पूछ लिया लेकिन कोई समाधान नहीं मिला।
    बेचारा एक दिन एक पंडित जी के पास पहुंच गया और बोला- पंडित जी कोई उपाय बताए मेरी शादी नहीं हो रही हमेशा टूट जाती है।
    पंडित जी ने कहा- शादी हो जाएगी, लेकिन सबसे पहले तुम लोगो से सदा सुखी होने का आशीर्वाद लेना बंद करो।

     

    संता मोबाइल कम्पनी में नौकरी लेने गया तो पहले ही सवाल का जवाब देने पर उसको भगा दिया गया!
    सवाल: सबसे बड़ा नेटवर्क कौन सा है?
    संता: कार्टून नेटवर्क!

     

    संता रोटी का एक निवाला खुद खा रहा था और एक पास बैठी मुर्गी को खिला रहा था…
    बंता :- “ ये क्या कर रहा है ? ”
    संता :- “ चिकन के साथ रोटी खा रहा हूँ ”

     

    एक नीग्रो बस में अपने बच्चे के साथ जा रहा था….
    कंडक्टर ने उसका बच्चा देखकर कहा- “इतना काला बच्चा मैंने आज तक नहीं देखा”……
    नीग्रो को गुस्सा आया, लेकिन वो कुछ नहीं बोला और सीट पर आकर मुह फुलाकर बैठ गया।
    संता ने उससे पूछा: “क्या हुआ भाई साहब”?
    नीग्रो ने संता से कहा: अरे यार, उस कंडक्टर ने बेइज्जती कर दी। . . . .
    संता : अरे मार साले को जाकर . . . ला ये चिम्पांजी का बच्चा मुझे पकड़ा दे… साला काटेगा तो नहीं…….. 😛😝😛😝

     

    संता पेड़ पर उल्टे लटके हुए था,
    बंता ने पूछा – क्या हो गया?
    संता- कुछ नहीं, सिर दर्द की गोली खाई है, कहीं पेट में ना चली जाए.!!!😄😄😄😄😁😂😂

     

    बीवी – सुनो जी, जब हमारी नयी नयी शादी हुई थी,
    तो जब मैं खाना बना कर लाती थी तो तुम खुद कम खाते थे,
    मुझे ज्यादा खिलाते थे।
    संता – तो ?
    बीवी – तो अब ऐसा क्यों नहीं करते ?
    संता – क्यूंकि अब तुम अच्छा खाना बनाना सीख गयी हो….

     Latest Santa-Banta Jokes in Hindi

    संता :- तुम्हे कैसी बीबी चाहिये ?
    बंता :- चाँद जैसी।
    संता :- चाँद जैसी, मतलब ?
    बंता :- जो रात को आये और सुबह होते ही चली जाये। 🙂 🙂 🙂


    संता की मज़ाकिया बीवी
    संता :- मेरी बीवी इतना मज़ाक करती है कि क्या बताऊं।
    बंता :- कैसे ?
    संता :- कल मैंने उसकी आंखों पर हाथ रख कर पूछा
    मैं कौन? तो वो बोली “दूध वाला।”

     

    बंता ने शादी के लिये अपने बॉस की लड़की का हाथ मांग लिया।
    बॉस ने गुस्सा करते हुये बोला :-
    साले अपनी औकात देखी हैं, जितनी तुझे सैलेरी मिलती हैं, उतने पैसो में तो मेरी बेटी के लिये टॉयलेट पेपर भी नहीं आयेगा।
    बंता बोला :- अच्छा, अगर आपकी लड़की इतनी पॉटी करती हैं, तो फिर शादी की बात अब रहने ही दो। 😉

     

    Santa(संता): हम पति-पत्नी तमिल सीखना चाहते हैं!
    Banta(बंता): वो क्यों?
    Santa(संता): हमने एक तमिल बच्चा गोद लिया है!हम सोचते हैं जब वो बोलने लगे तो उससे पहले पहले हम तमिल सीख लें!😬😂

     

    Santa(संता) – डॉक्टर साहब 2 साल पहले मुझे बुखार आया था ।
    डॉक्टर- तो अब क्या ?
    Santa(संता) – आपने नहाने को मना किया था, आज इधर से गुजर रहा था तो सोचा कि पूछता चलू ..”अब नहा लूँ क्या” ??😆😎😎😜😜😜

     

    संता का सर फट गया….
    डॉक्टर:- ये कैसे हुआ?
    संता:-मैं ईंट से पत्थर तोड़ रहा था।
    एक आदमी ने मुझसे कहा, “कभी खोपड़ी का इस्तेमाल भी कर लिया कर।”

     

    संता :-आज फिर मुझे आलिया भट्ट को किस करने को दिल कर रहा है ।
    बंता:-क्या ??????तुम आलिया को पहले किस कर चुके हो?
    संता:- नहीं, एक बार पहले भी दिल किया था ! 😀

     

    एक मोटरसाइकिल वाले ने पता पूछने के लिए संता से पूछा….
    Excuse me… मुझे “लाल किला” जाना है ?
    संता: तो जा ना भाई, ऐसे हर किसी को बताते बताते जायेगा तो पहुचेगा कब ?? 😜😜😀😂😃

     

    संता ने एक हलवाई की दुकान पर आधा किलो जलेबी लेकर खाई और बिना पैसे दिए जाने लगा..
    दुकानदार बोला – अरे जलेबी के पैसे तो दिए जा ।
    संता – पैसे तो है नहीं ..
    इस पर दूकानदार ने अपने नौकर को बुला कर संता की भरपूर पिटाई करवा दी।
    पिटने के बाद संता उठा और हाथ पैर झाड़ते हुए बोला- इसी भाव पर एक किलो और तौल दे ।😛😃😃

     Hindi Jokes on Santa Banta

    संता अंडरवियर लेने दुकान पर गया।
    दुकानदार ने उसे 300 रूपये का अंडरवियर दिखाया।
    पैसे सुनकर संता बोला: यार रोज पहनने वाला दिखाओ,पार्टीवियर नहीं चाहिए।

     

    टीचर :- संता बताओ लडकिया दुपट्टा क्यों ओढ़ती है।
    संता :- विज्ञान के कारण।
    टीचर :- वो कैसे ?
    संता :- विज्ञान के हिसाब से,
    खाने पीने की चीजो को ढककर रखना चाहिए। 🙂 🙂

     

    संता और बंता शादी में गये।
    संता ने खाने की प्लेट में टीशु पेपर देखा।
    टीशु पेपर को संता ने खाने की चीज समझा और उसे खाने लगा।
    संता को टीशु पेपर खाते देख बंता बोला –
    ओये मत खा यार इसको साला फीका हैं। 🙂 🙂 🙂

     

    हिंदी में संता बंता जोक्स और चुटकुले, बंता दुकान पर
    हिंदी में संता बंता जोक्स
    संता :- यार ये नया फ़ोन किसका है, बड़ा मस्त लग रहा हैं।
    बंता :- मेरा नहीं हैं, यार।
    संता :- फिर किसका हैं।
    बंता :- गर्लफ्रेंड का उठाया हैं।
    संता :- क्यों ?
    बंता :- यार वो रोज कहती थी, आप मेरा फ़ोन नहीं उठाते।
    आज मुझे मौका लगा तो मैंने उठा लिया। 😉 😉

     

    संता (नौकर से) – ज़रा देख तो बाहर सूरज निकला या नहीं ?
    नौकर – बाहर तो अँधेरा है !
    संता – अरे तो टॉर्च जलाकर देख ले कामचोर 😆😎😎😜

     

    संता एक बार double decker वाली बस में चढ़ गया ….कंडक्टर ने उसे ऊपर भेज दिया , संता थोड़ी ही देर में भागता हुआ वापिस आया और बोला
    ” साले मरवाएगा क्या ऊपर तो ड्राइवर ही नहीं है “😄😄😄😄

     

    संता शराब पीकर नंबर dial करता है , तभी लड़की की आवाज़ आती है ” Call करने के लिए आपके पास पर्याप्त Balance नहीं है , कृपया recharge करवाएँ
    संता : बस जानेमन तुमसे बात हो जाती है ये ही काफी है मेरे लिए

     

    संता : आज सुबह एक बिल्ली ने मेरा रास्ता काट दिया
    बंता : फिर ?
    संता : फिर क्या आगे जाकर उस बिल्ली का एक्सीडेंट हो गया। ….. साला हमसे पंगा

     

    संता और बंता शराब के नशे में धुत्त होकर रेल की पटरियों के बीचों-बीच जा रहे थे….
    संता : हे भगवान, मैंने इतनी सीढ़ियां पहले कभी नहीं चढ़ीं
    बंता : अरे सीढ़ियाँ तो ठीक हैं, मैं तो इस बात को लेकर हैरान हूं कि हाथ से पकड़ने के लिए रेलिंग कितने नीचे लगी हुई हैं …..😄😄😄😀😀😀😀

     

    बंता wife को English सिखा रहा था।
    दोपहर में Wife बोली, “Dinner लो जी”…..
    बंता – जाहिल औरत ये Dinner नही Lunch है….”
    Wife – जाहिल तू, तेरा सारा ख़ानदान करमफूटे….ये रात का बचा हुआ खाना है… दिमाग मत दौड़ा, रोटी चरले।

     

    संता के हाथ में नया फोन देखकर बंता बोला: नया फोन कब खरीदा?
    संता : नया नहीं, गर्लफ्रेंड का है!
    बंता : गर्लफ्रेंड का फोन क्यूँ ले आया?
    संता :रोज कहती थी, मेरा फोन नहीं उठाते..! आज मौका मिला, तो उठा लाया!!

     Latest Santa Jokes in Hindi with Images

    भिखारी: 5 रुपए का सवाल है बाबा !
    संता: पूछो, शायद मुझे आता हो।
    भिखारी: बेहोश …..संता rocks….

     

    संता पहली बार 5 स्टार होटल में गया… झिझकते हुए चाय का आर्डर दिया….
    कुछ ही मिनट में एक सजा धजा वेटर एक केतली में गर्म पानी, एक केतली में दूध, एक चाय पत्ती का पाउच और थोड़े चीनी के क्यूब देकर चला गया… संता ने जैसे तैसे चाय बना कर पी ली…

     

    थोड़ी देर बाद वेटर आया और पूछा : would u like to have anything more, sir?
    संता बोला : इच्छा तो बिरयानी खाने की भी थी, पर रहने दो … मुझे बनाना नहीं आता !!!


    संता :- तुम ऑपरेशन कराए बिना ही हॉस्पिटल से क्यों भाग गए ?
    बंता :- नर्स बार बार कह रही थी कि डरो मत, हिम्मत रखो, कुछ नहीं होगा.. ये तो बस एक छोटा सा ऑपरेशन है!
    संता :- तो इसमें डरने वाली कौन सी बात है ? सही तो कह रही थी नर्स !
    बंता :- साले, वो मुझसे नहीं डॉक्टर से कह रही थी !!!

     

    संता बंता के घर गया।
    बंता के घर जाकर संता ने सामने बंता और उसकी पत्नी की फोटो रखी देखी।
    फोटो देखकर संता बोला :-
    तुम्हारी और भाभी जी की जोड़ी राम और सीता के जैसी हैं।
    संता की बात सुनकर बंता बोला :- कहाँ हैं यार..
    आज तक ना तो तेरी भाभी को कोई रावण लेके गया, और ना ही आज तक ये खुद धरती में समायी। 😉

     

    संता बहुत लंबी यात्रा करके आया
    वाइफ : कैसा रहा सफर ? 🙂
    संता : थकान बहुत है, रात भर मैं सो नहीं पाया, उपर की बर्थ मिली थी हवा आ ही नहीं रही थी। 😟
    वाइफ : तो किसी से बर्थ एक्सचेंज कर लेना था। 😔
    संता : अब तू मुझे मत समझा। जब नीचे की दोनो बर्थ पर कोई आया ही नहीं, तो किससे एक्सचेंज करता ?? 😠😡😡😡😠

     

    संता ने पूछा बंता से :- एक साल में कितनी रात्रि आती हैं।
    बंता बोला :- 10
    संता :- कैसे ?
    बंता बोला :- 1 शिवरात्रि आती हैं, 9 नवरात्री आती हैं।
    संता :- आज तक बेचारा बेहोश हैं। 🙂 🙂 🙂

     

    पांचवी क्लास में में पांच बार फेल होने पर दुखी होकर
    बंता ने संता से कहा आज मैं खुदखुशी करने वाला हुँ!

    Tags - Latest Santa-Banta Jokes in Hindi, Hindi Jokes on Santa Banta, Latest Santa Jokes in Hindi with Images.

    दोस्तों अगर आपको हमारी जानकारी अच्छी लगी तो आप इसे शेयर करे और किसी भी प्रकार की जानकारी के लिए कमेंट करें और हमें फालो कर ले ताकि आपको हमारी हर पोस्ट की खबर मिलती रहे।